Sunday, July 27, 2014

You left so much inside me!

You left so much
inside me,
and it's too heavy
to move on my own.
I left so much
inside you,
that I've lost direction
to all
I've ever known

R M Drake

Sunday, May 4, 2014

वादों के गड़े मुर्दे अब न उखाड़ो !

वादों के गड़े मुर्दे अब न उखाड़ो !
चैन से साँस लेना हो तो
वादों का गला घोटो और
चुपके से दफ़ना आओ

वादे अपने वो बच्चे हैं
जिनके मारे जाने पर
पड़ोसी सवाल नहीं पूछते
दोस्त अफ़सोस नहीं जताते
किसी को कानों-कान
खबर नहीं होती और
मातम के रस्म से भी
हम बच जाते

और दस्तूर है  ...
वादों का तकाज़ा करने वालों ने
बेवफ़ाई की तगड़ी फ़सल काटी है
इसलिए
वादों के गड़े मुर्दे अब न ही उखाड़ो !

Saturday, March 29, 2014

भगवान को खाँसी आयी थी !

जब कहा था तुमने प्यार हुआ
और मैं भी तैयार हुआ
….. तो ज़िन्दगी ने
ऐसी कड़क छौंक लगायी थी
कि भगवान को खाँसी आयी थी!

Thursday, March 20, 2014

मैं मनुष्य हूँ !

श्वान कितना भी उन्मत्त हो
भौंकता है, गुर्राता है ..  पर
स्वयं को काट न खाता है
मैं मनुष्य हूँ - यह दर्शाता है!

Thursday, May 17, 2012

कब  मैंने  बोला ..


एक आस जो लेकर  जीता  हूँ , तो  तुम  क्यों  घबरा  जाते  हो 
कब  मैंने  ऐसा  बोला  है , कि  आकर  इनको  सच  कर  जाना 

मैं तो  सहरा , सदियों  से  प्यासा  
गंगा  को  क्या  मैं  जानूंगा  
छोटी  सी  एक  बावरी  को  भी 
सागर  से  बढ़कर  मानूंगा 
देना  न  देना  तुम्हारी  मर्जी ,
पर  चाहने  पर  किसी  का  जोर  नहीं 
फिर  मेरी  दो  घूँट  कि  आशा 
क्यों  सबको   सताती  है  इतना 

मुझसे  मेरी  प्यास  न  छीनो, और  न  इसका  इल्जाम  ही  दो 
कब  मैंने  बोला  गंगा  से  कि ,  प्यास  मेरी  बुझा  जाना 

मन  बच्चा  है , बहक  जाता 
बहल  भी  जायेगा , ऐसे  ही 
आज  हिचकता  है , आंसू  बहाता
संभल  भी  जायेगा , ऐसे  ही 
अपनी  बात  पर  खरा  उतरता  तो ,
उम्मीद  भी  रखता , वैसा  ही 
तभी  रोता  है  जब  ये  समझ  जाता 
कि  वो  बात  कही  थी  तुमने , ऐसे  ही 

आज  मेरी  पुकार  को  सुन , क्यों  तुम   पीछे  हट  जाते  हो 
कब  मैंने  ऐसा  बोला  कि , बिसरे  बातों  को  निभा  जाना 




Monday, January 2, 2012

और कौन?

एक छोटी सी लड़की को, मैं प्यार तो इतना कर बैठा
डेरा ऐसा डाला दिल में, कि अब आ पायेगा और कौन?

रचा जो परियों को होगा, फिर तो विधाता के आगे
प्रेरणा स्रोत एकमात्र, तू नहीं तो और कौन ?

आयेंगे भी तेरे कारण, तुमसे ही वो रुक पाएंगे
करता धर्ता मेरे आंसू का, है तेरे अलावा और कौन ?

आँखों कि सबसे दुलारी जो, वो चुभेगी गहरी एक दिन
जितनी अपनी उतनी ही परायी, हो पायेगा और कौन ?

एक शब्द नहीं बन पायेगा, एक हाथ नहीं बढ़ पायेगा
मेरी साँसों को यूँ समेट, ओझल हो जायेगा और कौन ?

उस महक में ऐसा डूबा हूँ, जिस फूल में बसती जान मगर
अजनबी तोड़ ले जायेगा जब, लाचार देखेगा और कौन?

बरसात में भूली भटकी सी, एक सूखी नदी उफनाई थी
बीतेगा जब ये मौसम, फिर बहेगा इसमें और कौन ?

एक बड़े उम्र में नन्हा सा मन, आज तो तुमने पहचान लिया
कल नन्हा जब वो रोयेगा, तो पुचकारेगा उसे और कौन?


Monday, October 10, 2011

क्यों ढूँढू तुमको मैं, जाने अनजानों में


जाना पहचाना सा, देखा था एक चेहरा 
टूट गया पल में, था दिल पर जो पहरा 
सामने आओ तो, तुम तुम नहीं लगती हो 
जैसे ही ओझल हो, क्यों जख्म लगे गहरा

बड़ी अजब पहेली ये, कैसे सुलझाऊं मैं 
क्यों ढूँढू तुमको मैं, जाने अनजानों में


एक बात पुरानी सी, रह रह कर याद आये 
जब करते थे मन की, चाहे दुनिया जल जाये 
फ़िक्र आज भी औरों की, करते हैं नहीं लेकिन 
जिक्र एक मगर सुनकर, दिल मेरा घबराये

उस बात पुरानी को, कैसे बिसराऊँ मैं 
क्यों ढूँढू तुमको मैं, जाने अनजानों में


संग हाथ पकड़ के जब, हम रस्ते चलते थे 
दिखता था सच में रब, जब संग में रहते थे 
होठों पर हंसी रहती, सपने से भरी आँखें 
अलग ही दुनिया इनकी, ये सारे कहते थे

दिल की दुनिया औरों को, कैसे दिखलाऊँ मैं 
क्यों ढूँढू तुमको मैं, जाने अनजानों में