Tuesday, November 30, 2010

माँ !


सामने तेरे जब भी आऊं, खुद को बच्चा ही पाता माँ !
बड़ा होने का ढोंग मगर, क्यूँ सब से करना पड़ता है  
मंदिर न जाने पर मुझको, हर कोई नास्तिक कहता माँ !
पर तेरे पैर जो छूता हूँ, तो क्यूँ न कोई समझता है

जब मुझको अक्षर-ज्ञान कराया, तब तुम ब्रह्मण का रूप थी,
लड़ना बुराई से जो सिखाया, तो वो क्षत्रियता की धुप थी,
वणिक गुण ही उसे जानूं मैं, चवन्नी तक का हिसाब मिलाना,
शुद्र कर्म से अलग वो कैसे, मुझको सुबह नहलाना-धुलाना,

            हम सबमें चारों वर्ण का लक्षण, तुझसे ही मैंने सीखा माँ !
            सदियों पुराना गलत विभाजन, आज भी पर क्यूँ चलता है
            मंदिर न जाने पर मुझको, हर कोई नास्तिक बोले माँ !
            पर तेरे पैर जो छूता हूँ, तो क्यूँ न कोई समझता है


मेरा हिस्सा सबसे पहले, मेहमान जब भी लाये मिठाई,
कुर्सी पंखा मेरे जिम्मे, दिवाली में जब घर की सफाई,
मेरे लिए रोज बचाकर, गुड़ के साथ मलाई खिलाना, 
मीठी सी उस झिड़क के संग, कभी कभी झापड़ भी लगाना,

             रूचि और अरुचि वो मेरी, बिन बोले तुमको मालूम माँ !
             कुछ तो खुद भी भूल गया मैं, तुम्हें ही बताना पड़ता है
             मंदिर न जाने पर मुझको, हर कोई नास्तिक बोले माँ !
             पर तेरे पैर जो छूता हूँ, तो क्यूँ न कोई समझता है

नमक लेने उस दिन जो निकली, ये क्यों नहीं बताया था 
छुट्टे देख लड्डू खाने को, मैं कितना रोया था चिल्लाया था 
एक न मानी तेरी फिर भी, आशीर्वाद ही देती तू 
सब बोलें सिरचढ़ा मुझे पर, अच्छा-प्यारा ही कहती तू 

                  उलझन गहरे इतने मन में, फिर भी कुछ नहीं जताती माँ !
                  तुच्छ दुःख हर बार ये मेरा, पर तेरे ही आगे उमरता है 
                  मंदिर न जाने पर मुझको, हर कोई नास्तिक बोले माँ !
                  पर तेरे पैर जो छूता हूँ, तो क्यूँ न कोई समझता है

थककर चूर जब सोने जाता, पैरों में वो तेल की मालिश 
तौलिये से बालों को सुखाना, स्कूल से आते जो हुई थी बारिश 
बचपन में बड़े होने का, वो जिद कितना बचकाना था 
आज जाके जो जाना मैं, तूने तब से पहचाना था   

               चिडचिडा हूँ अभी भूख के कारण, बस तू ही ये समझे माँ !
               दृष्टि क्षय हो जाने पर भी, मुझसे ज्यादा तुझे दिखता है 
               मंदिर न जाने पर मुझको, हर कोई नास्तिक कहता माँ !
               पर तेरे पैर जो छूता हूँ, तो क्यूँ न कोई समझता है

Tuesday, November 16, 2010

विरोध

हेय दृष्टि से देखते हो, कि हर क्षेत्र में वो आ जाते हैं
खुद का भी तो एक घर होगा, क्यूँ वहां नहीं रह पाते हैं
अपने घर से दूर मगर, मनुज इच्छा से क्या जाता है
बस बच्चे भूख से रोयें तो, एक पिता देख नहीं पाता है

घर छोड़ निज इतने दूर जाना, यदि इतना ही आसान होता
क्यूँ फिर तुम्हारे ही आँगन में, मजबूर हो किसान कोई जान देता
निज कुटुंब को ही निभाने को, वो क्रूर जीवन जी लेते हैं
बस आधी-पेट भरने को फिर, अपमान-शोषण पी लेते हैं

लाचार कमजोर और बेबस जो, उनपर ही जोर दिखाते हो
यदि इतना ही दम है तो फिर, पैसेवालों को क्यूँ न भगाते हो
झुण्ड बनकर जो आते हो, और अकेले निरीह को करते ढेर
अपने गली में पर भूलना मत, कुत्ता भी बन जाता है शेर

हमारे घर के कायर कुछ, ऐसे भी तुम्हारे घर बसते हैं
झुठलाकर अपने नाते को जो, फीकी हंसी सबके संग हँसते हैं
उनको भी यदि तुम मारोगे, सह न चुपचाप सहेंगे हम
एक अंग बीमार हुआ तो क्या, काटकर न फेंक सकेंगे हम

न मानोगे तुम पर कभी कभी, हमारे घर भी मेहमान आते हैं
तुम्हारे दिए सत्कार को वो सुन, लज्जा से शीश झुकाते हैं
कुल के कपूत दो-चार मगर, हर घर में ही हो जाते हैं
कुछ पशुओं का चारा खा गए, तो कुछ शहीदों के घर को चुराते हैं

नाव से आये थे जब वो, चंडाल विनाश मचाने को
हर घर से दौड़े थे सब, तुम्हारे घर को फिर बचाने को
हर आँख से अश्रु गिरा उस दिन, हर घर ने मातम मनाया था
तब बिल में छुप गए थे क्यों, क्यूँ विरोध नहीं जताया था

उपेक्षा कर जो हँसते हो, उनकी लाचारी से होकर अनजान
निष्कर्ष उनकी चुप्पी का पर, ये न लेना कि वो हैं नादान
जिस दिन वो आह सुनोगे तुम, स्थिर खड़े नहीं रह पाओगे
सहोदर के अंतर्मन को देख, स्वयं भी अश्रु बहाओगे

तेरा घर मेरा घर क्यों कर, जब सारा मोहल्ला अपना है
जिनको तुम देखा करते हो, हम सबका वैसा ही सपना है
दूजे के आँगन को भी गर, एक दीप कभी जगमगाता है
क्यूँ किया पराया घर रोशन, सोच कभी नहीं पछताता है

सिर्फ मेरे घर कि बात नहीं, तुम्हारा भी तम से नाता है
ये माना जल्दी दिखे नहीं, बाहरी चकाचौंध में छुप जाता है
पर अन्दर जाकर जो देखेंगे, इक भयावह जर्जर सत्य वहाँ
उत्सव-आत्महत्या इक संग, क्रूर विडंबना ऐसा और कहाँ

एक ही करता बुरा काम मगर, पर नाम सबका आ जाता है
एक ही पापी अपराध करे, पूरे घर पर कलंक छा जाता है
उस पाप से जो तुम्हारा मत नहीं, तो विरोध करो न चुप रहो
बैठा है मोहल्ला यूँ सकदम, कुछ तो कहो ऐसे न सहो

बहुत देर यदि तुम चुप रह गए, सन्देश गलत फिर जायेगा
भाइयों में अविश्वास का फिर, अन्धकार मगर घिर जायेगा
नफरत और घृणा के बलपर, बोलो कहाँ तक जाओगे
रचकर एक और महाभारत, बोलो तुम क्या पाओगे

सौहार्द की बात जो करते हैं, कमजोर समझने की भूल न कर
जल्द अपनों से नहीं झगड़ते हैं, मुर्खता भरी कौतहूल न कर
भाइयों के युद्ध में क्या जाने, कौन जीता किसकी हार है
नैया डुबोके क्या पाओगे अब, जबकि बीच मझधार है

तोड़ने से कभी मिले नहीं, जोड़ने से बढती है ताकत
सम्भावना-सुख जीत की तभी, अपने जब होते हैं निकट
एकता में ही बल है ये, ज्ञानी गुरु सभी समझाते हैं
तुम्हारा छोटू हमारा कप्तान, मिलकर ही तो छक्के छुड़ाते हैं

Sunday, November 14, 2010

ऐसे मगर हम साथ तो हैं



दिखते अलग किनारों की तरह, ऐसे मगर हम साथ तो हैं 
दरिया सूखे तो जानेंगे सब, इक जिस्म के ही दो हाथ तो हैं 


कुछ बोलिए न उनके खिलाफ, वादों को भुलाके जो निकले 
माना कि हम दिखाते नहीं, पर अब भी दिल में जज्बात तो हैं 


मशगुल हुए अब जो इतना, मत सोचना तो सब भूल गए  
दिन रहा यार-व्यापार के नाम, रोने के लिए ये रात तो हैं 


हँसते हैं अब याद आये जो, वो जन्मों संग रहने के वादे 
न बदले हम न बदले तुम पर, बदले हुए ये हालात तो हैं 


जो लेकर एहसान माना था, उधार के उन झूठे सपनों का, 
रो-रोकर अब जो चुकाते हैं, उनके ही ये करामात तो हैं 

Wednesday, November 3, 2010

एक रास्ता सब के लिए तो इस जीवन ने छोड़ा है



बस दो पल का वो अंतर, और वर्षों का अथक प्रयास
पाट न पाया कोई अबतक, सागर बूँद से गया हार
अब न ऐसा सोचेंगे, एक क्षण का मिलन भी थोड़ा है
एक रास्ता सब के लिए तो इस जीवन ने छोड़ा है


हमने जो भी कहा था तुमसे, तुम किसी से न कहना
हर पल जो चुपचाप सहा था, तुम कभी भी न सहना
टूट गयी थी बांध जो मुझसे, जाने में अनजाने में
उन दीवारों से दूर ही, धीरे-धीरे तुम बहना


             सागर दूर हुआ तो क्या, तुम गंगा में ही मिल जाओ
             जो अपना लेता है हंसकर, वहीँ तो सच्चा बसेरा है
             एक रास्ता सब के ................


राम ने जब प्रत्यंचा चढ़ाई, तभी जानकी आई थी
मोहन के मुरली को सुनकर, राधा नहीं रुक पाई थी
देर से ही पर मिली थी ठंडक, उर्मिला की आह को
श्याम का रस जो विष-प्याला में, मीरा नहीं भरमाई थी


            धनुष, बांसुरी, समय, गरल या और भी कोई शर्त हो तो
            पर ज्ञात नहीं कब ख़त्म है मेरा, और कहाँ से शुरू तेरा है
            एक रास्ता सब के ....................

Monday, November 1, 2010

किस आस से

हर बार मिला तो ये सोचा, दोबारा फिर न जायेंगे
पर लगता है कि दिल के साथ, खुदगर्जी भी छोड़ आये हैं

प्यार तुम्हें इतना करते हैं, फिर भी रोक न पाएंगे
किस आस से न जाने फिर, सब से मुह मोर आये हैं

चलते चलते न जाने कब, ऐसे मोड़ पे आ पहुंचे
अपने भी दूर हुआ जाते, और पराये तो पराये हैं

सबने पाया कुछ मुझे छोड़, तो दोष कहाँ तेरा इसमें
किस्मत की ही बात थी, जो बर्फ से भी जलकर आये हैं

तगादे को सब ढूंढ रहे, जब डूबे हैं इतने कर्जे में
ख़ुशी से भी आंसू, हम उधार मांग कर लाये हैं

हँसते हुए जब आये वो, खड़े थे तब अचकाए से
बिछुड़ने का डर कहाँ, जब मिलने से ही घबराये हैं

डूबे जिस घाट वहीँ पीने, फिर से हम तो आ पहुंचे
हँसे दुनिया तो हंसने दो, अब आये हैं तो आये हैं

Friday, October 15, 2010

और न कोई होगा

कौन करेगा हंसकर तुमसे, घंटों फ़ोन पर बात
रिंग होते ही दौड़ पड़ेगा, दिन हो या हो रात
आठवीं बार भी उस किस्से को, सुनके जो न चिढेगा
वो तो बस, मैं ही था और न कोई होगा

कौन पढ़ेगा सांस रोककर, ख़त को तुम्हारे यार
फिर अगले की बेसब्री में, जब टोकेगा दस बार
तब डाकिये की झिड़क से भी, जिसका मन न दुखेगा
वो तो बस, मैं ही था और न कोई होगा

कौन हंसेगा बिना बात के, याद अगर कुछ आये
उस दो पल की तफरी पर, जो घंटों तक मुस्काए
मनचाहा कुछ न भी हो तो, एक शब्द न कहेगा
वो तो बस, मैं ही था और न कोई होगा

कौन रहेगा खोया इसमें, कि कैसे तुम्हें हंसाएं
आज जो सर ने गुड बोला, मौका पाकर तुम्हें बताएं
तुमको ही सब देकर भी, तुम्हारा एहसान कहेगा
वो तो बस, मैं ही था और न कोई होगा

Thursday, October 14, 2010

चुप ही फिर रह जाना

क्षमा मांगना तभी सखे जब हुयी हो भूल अचानक
सोच-समझके किया हो जो, तो चुप ही फिर रह जाना

पीछे से कुछ बोलना मत चर्चा अगर हो मुझपर
नजर मिलाके बात किये हो गया है एक जमाना

न आना हो तो न आना, हम मन को समझा लेंगे
आकर चले जाने से बदनाम होता है अपना फ़साना

ऐसे तो सब ही चलते हैं, फर्क क्या तुझमें मुझमें
तुझे चाहिए थी मंजिल मुझे बस तेरा साथ था पाना


तेरी मर्जी तो मेरी मर्जी, मेरी मर्जी भी रही मेरी
बहलाने को दिल को और मिलता न कोई बहाना 


रंजिश है अब हर पल मन में, दोस्त कहाँ फिर आयें
अपनों के लिए अब दिल में रहा न कोई ठिकाना

Monday, October 11, 2010

इस कारण डूब नहीं पाया

मुझको इश्क के दरिया तक तो तेरी याद ने पहुँचाया
हल्का हुआ जो दिल खोकर, इस कारण डूब नहीं पाया

तुम जो मेरे साथ नहीं तो, यह भी मर्जी मेरी है
क्यूँ घबराना यह तो बस, दो-चार जन्मों की देरी है
गर सात जनम भी बीत गए तो, न होगी कोई व्याकुलता
चाँद से जो मिले हों उनके लिए न रात अंधेरी है

तुम्हारी मर्जी और मेरी मंशा में कभी कोई अंतर था
तुमने कभी न जाहिर की और मैं भी जान नहीं पाया
हल्का हुआ जो दिल खोकर...............

लोग कहीं कुछ पूछ ही लें तो, कुछ बोले न बनता है
कभी सामने आ जो गए तो, मन मेरा ये डरता है
कैसे तुमसे बात करेंगे, आँखें फेर न पाएंगे
वो आलिंगन अब नहीं संभव, मन कहाँ ये समझता है

साँसों से छू सकते फिर भी, होगी सदियों की दूरी
आँखों से बस टटोलते थे, शब्द कहाँ कोई बन पाया
हल्का हुआ जो दिल खोकर...............

अब तो मेरी ये उदासी, मेरे साथ ही रहती है
सुन न पाए, दूजा कोई, चुपके-चुपके कहती है
होता न कोई तुमसे बढ़कर, इस जग में मेरे पास
इक लड़की कुछ दिन से मगर, एक नाम नहीं लेती है

दो ही चीज मेरे, पास थे उनके, इक हंसी इक जान
वो लौटना भूल गए और मैं भी मांग नहीं पाया
हल्का हुआ जो दिल खोकर............

Sunday, October 10, 2010

टिकता नहीं जरा भी.......

हुए लथपथ जो खून से तो याद अचानक आया
कोई कहता था मुझपर लाल रंग बहुत फबता है

टिकता नहीं जरा भी फिर घाव भरे ये कैसे
कमबख्त वक़्त का मरहम चलता चला जाता है

अपने सुकून की खातिर जिसे दूर किया था तुमने
कभी सुनते जब वही नाम तो क्यों सुकून चुभता है

गंगा की वो बड़ी धार जिसे कभी डिगा न पाई
गालों पर गीली लकीरों में, वो असहाय बहता है

पढ़-लिखकर भी खा गए हम सच्चाई से मात
दुनियादारी का पाठ कहाँ किसी किताब में मिलता है

एक अरसा बीत गया अब साफ़ करो इस दिल को
महीने में इक बार तो ये चाँद भी धुलने जाता है

जो कम है उसका मोल बहुत, जो बहुतायत वो कौड़ी
सागर कितना खारा, नदी में मीठा जल बहता है

Saturday, October 9, 2010

स्याही के दो बूँद

एक ही जगह बने, एक ही डिबिया में भरे गए
अक्षर बनने को तत्पर, दो बूँद स्याही के विदा हुए
एक ही तत्व, एक ही रंग, बचपन से सदा रहे संग
कितना अच्छा हो यदि, एक ही शब्द के बने अंग
अंकित होकर एक पृष्ठ पर, यह साथ अमर हो जाएगा
दो अलग वर्ण, अपूर्ण मगर, मिलकर एक अर्थ नया दे जाएगा
मन में ही यह बात थी, अभी स्वर भी न उसे मिल पाया था
पर दूर कहीं चौंका एक स्वप्न, और नियति थोडा मुस्काया था

डिबिया खुली, मुहूर्त बनी, दोनों बढे-चले हँसते गाते
कितने अबोध, क्या ज्ञात उन्हें, हर स्याही शब्द न बन पाते
लिखने से पहले कभी-कभी, जब कलम झाड दिए जाते हैं
फिर सबसे उत्सुक हो आगे जो, वो बूँद धुल बन जाते हैं,
नयी परिभाषा रचने को, एक शब्द बनना था जिनका धाम
पर एक गिरा झड़कर नीचे, दूसरा पृष्ठ पर बना पूर्ण-विराम
एक धुल बना, एक अर्थहीन, दोनों का मन भर आया था
नीले स्याही से टपके थे पर उसे लाल नियति ने पाया था

जो डिबिया से ही थे सीधे गिरे, वो बूँद जरा झल्लाते थे
अपनी गाथा उन्हें सुना, उनको वे समझाते थे
शब्द रचने वाले नोक-देव, जो कलम मंदिर में स्थापित हैं
उन्हें सिक्त करने की चाह लिए, हम भी तीर्थ पर थे निकले
पर देव-दर्शन से पहले ही, धरती ने सब रस सोख लिया
तुम्हे विलाप का अधिकार नहीं, जब आये नोक सिंचित करके
अब धुल बने या बने चिन्ह, ये सब तो है बस एक माया
हुआ स्तब्ध बूँद, रो पड़ा स्वप्न, अट्टहास नियति ने फिर लगाया

Thursday, September 30, 2010

रेस्तरां में एक शाम

जिंदगी की मेनू से एक दोस्त आर्डर किया था
और कहा था वेटर से, गुस्सा थोडा कम डालना

ईर्ष्या रत्ती भर भी नहीं, मगर भरोसा हो भरपूर
समझदारी का स्वाद हो और जो जाने थोडा मुस्कुराना

कुछ समय भी हो मेर लिए, और जायका भी वफादारी का
छिछोरा बिलकुल न हो, मस्ती के मिर्च से फिर छौंक देना

सच्चा जिसका रंग हो, नफरत से थोडा तंग हो
लालच का तेल नहीं, संतोष के घी में उसे पकाना

महत्वाकांक्षा का तत्व हो और बुद्धिमानी का मसाला
अनुभव की धीमी आंच पर उसे धीरे-धीरे सीझाना

पाचन कमजोर होने पर भी जो पेट को ना सताए
अनदेखा करे मेरी कमी को, ऐसा क्षमा का रस मिलाना

मेहनत का नमक हो, ईमानदारी की चमक हो
भाई से जो कम न लगे, ऐसा सुगंध अपनेपन की फैलाना

वेटर मुस्कुराया और बोला, ऐसे आर्डर में तो टाइम लगता है
आजकल जो जल्दी बन जाए, वो मतलब का फास्ट-फ़ूड चलता है

ढोंग की चासनी में सराबोर, ऊपर से प्रपंच की वो छौंक
पोषण रत्तीभर भी नहीं, जिसे खाकर पेट जलता है

बार-बार खाकर भी जिसे बिलकुल भी मन न भरे
कभी लालच की अपच करदे, तो कभी फरेब का डकार बनता है

आर्डर अगर ये ले आऊं तो फास्ट-फ़ूड कभी न खा पाओगे
झुण्ड से भी निकाले जाओगे, यही इसका दाम लगता है

Wednesday, September 29, 2010

आज का "एथिक्स"

सबके सामने बड़ी-बड़ी बातें, लम्बे वादे करते हैं
निभाने के समय मगर कुछ शर्तें नयी ले आते हैं
ढाबे की तरह दाम वसूला, बंटना था भंडारे का भोग
कितने "एथिकल" हैं कुछ लोग......

आश्रय देने का एहसान, किराया पाकर भी दिखाते हैं
अबाधित अधिकार बताकर, नए दायरे निस दिन बनाते हैं
अनिवार्य निमंत्रण का प्रचलन, वो यहाँ बेधड़क चलाते हैं
ऐसे ही तो नहीं वो "एथिकल" कहलाते हैं........

वो कहते तुम नहीं सीखते, हम तो बहुत पढ़ाते हैं
आज की लीक में वो बात, वो जज्बा हम नहीं पाते हैं
इसी कारण अब आधा "लेक्चर", तुमसे ही "प्रेजेंटेसन" करवाते हैं
हर कदम बड़े गर्व से "एथिक्स" को हम अपनाते हैं.....

बिना म्याऊं की उस बिल्ली को, जिसका करती थी दुनिया मान
बना अपाहिज वो समझाते, "चेंज" हुआ ये बड़ा महान
कल चूहे थे शेर उसके आगे, बिचारी अब चूहों से ढेर
"एथिकल" लोगों के "विजन" का ही तो है यह फेर....

पांच "सेंचुरी" से सात "सेंचुरी" पर एक ही "इनिंग" में आते हैं
सात से बीस भी जल्द ही होगा, बड़े गर्व से इतराते हैं
फिर अनदेखा कर सच ही कहते, दूसरों का कष्ट न देखा जाता
आखिर "एथिक्स" से है हमारा बड़ा गहरा नाता.....

पूरा भी जहाँ रहा अधुरा, फिर भी कोई नहीं हैरान
"क्वालिटी" छोड़ "क्वांटिटी" पर जिनका हर पल ध्यान
देंगे नहीं पर बहुत चाहिए, ऐसा सम्मान का व्यापार
बनता है किसी बड़े आदमी के "एथिक्स" का आधार.....

Sunday, September 19, 2010

कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

हथेलियों पर बाकी अबतक उस स्पर्श का आभास
जैसे धुले थाली से आये कल के पकवान की सुवास
आज मगर सूखी रोटी खाकर सो जाना तो होगा
कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

जिन यादों की रंगोली से सजती थी मुस्कान
हवा के झोंके ने बिखराकर सब किया धूल समान
फीकी ही सही, आंधी थमने तक, मुस्काना तो होगा
कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

जिन होठों की ठिठोलियों से गूंजा था आसमान
वो हंसी, वो किलकारी देते थे सपनों को प्राण
सन्नाटे की संगीत पर अब गुनगुनाना तो होगा
कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

जिसका दर्शन अमृत होता, जो चेहरा था भगवान्
प्रेम-पुष्प से पूजन करके प्रेम-प्रसाद का करते पान
अब हुए नास्तिक फिर शून्य से नया पूजन तो होगा
कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

आशा के धुंधले शीशे से जीवन लगता एक वरदान
सच पाषाण ने चूर कर दिया, रहे अधूरे अरमान
शाप, अछूत होने का, अरमानों को निभाना तो होगा
कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

दोस्ती में यारों..............

दोस्ती में यारों हमसे गलती न हुयी ऐसी भी बात नहीं
मंशा तो बुरी न थी मगर बात उभरी तो थोड़ी गलत लगी
खुद छोटे न हो जाएँ इस कारण नहीं मेरी चुप्पी
मन मचला बहुत पर एक बात से बंद रही जुबान मेरी
माफ़ी अगर मांग लेते तो क्या दोस्ती न छोटी होती जाती ?
दोस्ती में यारों हमसे गलती न हुयी ऐसी भी बात नहीं

अब साथ न रहना खाना होता, रोज नहीं हम मिल पाते
एक ही शहर में रहते हैं फिर भी घंटों बात न कर पाते
फिर भी एक झलक को पाकर मन इतना निश्चिन्त हुआ
दोस्त तुम यहाँ हो जान कर अपने मन को हम समझाते
रिश्ता तो वही गहरा है जिसे निभाने की हो फ़िक्र नहीं
दोस्ती में यारों हमसे गलती न हुयी ऐसी भी बात नहीं


बचपन बीता, पढाई छूटी, बीत गए वो साल
स्कूल के बस्तों से भारी अब कन्धों पर जो भार
अब कहाँ गली के खेल तमाशे खो गया है वो संसार
चाहकर भी टिकने न देता समय का ये तेज प्रवाह
बह चले अलग दिशा तो क्या आगे संगम की आस रही
दोस्ती में यारों हमसे गलती न हुयी ऐसी भी बात नहीं

My Favourites - Dr Kumar Vishwas(4)

मै तुम्हें ढूंढने...........


मै तुम्हें ढूंढने स्वर्ग के द्वार तक
रोज जाता रहा रोज आता रहा
तुम ग़ज़ल बन गयी गीत में ढल गयी
मंच से मैं तुम्हे गुनगुनाता रहा

जिंदगी के सभी रास्ते एक थे
सब की मंजिल तुम्हारे चयन तक रही
अब प्रकाशित रहे पीड़ के उपनिषद
मन की गोपन कथाएं नयन तक रही
प्राण के पृष्ट पर प्रीति की वर्तनी
तुम मिटाती रही मैं हनाता रहा
मै तुम्हें ढूंढने...........

एक खामोश हलचल बनी जिंदगी
गहरा ठहरा हुआ जल बनी जिंदगी
तुम बिन जैसे महलों में बीता हुआ
उर्मिला का कोई पल बनी जिंदगी
वृष्टि आकाश में आस का एक दीया
तुम बुझाती रही मैं जलाता रहा
मै तुम्हें ढूंढने............

My Favourites - Dr Kumar Vishwas(3)

मांग की सिन्दूर रेखा.......


मांग की सिन्दूर रेखा तुमसे ये पूछेगी कल
यूँ मुझे सरपर सजाने का तुम्हे अधिकार क्या है ?
तुम कहोगी वो समर्पण बचपना था तो कहेगी
गर वो सबकुछ बचपना था तो कहो फिर प्यार क्या है ?
मांग की सिन्दूर रेखा.......

कल कोई अल्हर अयाना बावरा झोंका पवन का
जब तुम्हारी इंगितों पर गंध भर देगा चमन में
या कोई चन्दा धरा का रूप का मारा बेचारा
कल्पना के तार से नक्षत्र जड़ देगा गगन पर
तब यही बिछुआ महावर चूड़ियाँ गजरे कहेंगे
इस अमर सौभाग्य के श्रृंगार का आधार क्या है ?
मांग की सिन्दूर रेखा......


कल कोई दिनकर विजय का सेहरा सर पर सजाये
जब तुम्हारी सप्तवर्णी छांह में सोने चलेगा
या कोई हारा थका व्याकुल सिपाही जब तुम्हारे
वक्ष पर धर शीश लेकर के हिचकियाँ रोने चलेगा
जब किसी तन पर कसी दो बाँहें जुड़कर पूछ लेंगी
इस प्रणय जीवन समर में जीत क्या है हार क्या है ?
मांग की सिन्दूर रेखा........

My Favourites - Dr Kumar Vishwas(2)

मैं भाव सूचि उन भावों की...........

मैं भाव सूचि उन भावों की, जो बिके सदा ही बिन तोले
तन्हाई हूँ हर उस ख़त की, जो पढ़ा गया है बिन खोले
हर आंसू को हर पत्थर तक पहुंचाने की लाचार हूक
मैं सहज अर्थ उन शब्दों का जो सुने गए हैं बिन बोले
जो कभी नहीं बरसा खुलकर, हर उस बादल का पानी हूँ
लव-कुश की पीड़ बिना गायी, सीता की रामकहानी हूँ

जिनके सपनों के ताजमहल बनने से पहले टूट गए
जिन हाथों में दो हाथ कभी आने से पहले छूट गए
धरती पर जिनके पाने और खोने की अजब कहानी है
किस्मत की देवी मान गयी पर प्रणय देवता रूठ गए
मैं मैली चादर वाले उस कबीरा की अमृत-वाणी हूँ
लव-कुश की पीड़ बिना गायी, सीता की रामकहानी हूँ

कुछ कहते हैं मैं सीखा हूँ अपने जख्मों को खुद सीकर
कुछ जान गए मैं हँसता हूँ भीतर भीतर आंसू पीकर
कुछ कहते हैं मैं हूँ विरोध से उपजी एक खुद्दार विजय
कुछ कहते हैं मैं रचता हूँ खुद में मरकर खुद में जीकर
लेकिन मैं हर चतुराई की सोची समझी नादानी हूँ
लव-कुश की पीड़ बिना गायी, सीता की रामकहानी हूँ

My favourites - Dr. Kumar Vishwaas (1)

हार गया तन मन .........


हार गया तन मन पुकार कर तुम्हे
कितने एकाकी हैं प्यार कर तुम्हे

जिस पल हल्दी लेपी होगी तन पर माँ ने
जिस पल सखियों ने सौपी होगी सौगातें
ढोलक की थापों में, घुंघरू की गुनझुन में
घुलकर फैली होगी घर में प्यारी बातें
उस पल मीठी सी धुन सूने कमरे में सुन
रोये मन चौसर पर हार कर तुम्हे
कितने एकाकी हैं प्यार कर तुम्हे

कल तक जो हमको तुमको मिलवा देती थी
उन सखियों के प्रश्नों ने टोका तो होगा
साजन के अंजुरी पर अंजुरी कांपी होगी
मेरी सुधियों ने रास्ता रोका तो होगा
उस पल सोचा मन में आगे अब जीवन में
जी लेंगे हसकर बिसार कर तुम्हे
कितने एकाकी हैं प्यार कर तुम्हे

कल तक जिन गीतों को तुम अपना कहती थी
अखबारों में पढ़कर कैसा लगता होगा
सावन की रातों में साजन की बांहों में
तन तो सोता होगा पर मन जगता होगा
उस पल के जीने में आंसू पी लेने में
मरते हैं मन ही मन मार कर तुम्हे
कितने एकाकी हैं प्यार कर तुम्हे

( कवि - डॉक्टर कुमार विश्वास )

Friday, September 3, 2010

इस दुनिया में

मेरे भाई इस दुनिया में
कुछ चीज़ें हैं अजब बड़ी
सोमवार को प्रेम से खाया
मंगल को नॉन-वेज पाप बनी

एक माँ-बाप ने सबको पाला
माथे पे कोई शिकन नहीं
उसी एक माँ-बाप का जिम्मा
सब बच्चों की बला बनी
मेरे भाई इस दुनिया में
कुछ चीज़ें हैं अजब बड़ी

जो अनुभव देते पालक को
खुद के लिए उसकी आस नहीं
अपना लाल तो सिखाया मानेगा
जो दिखाया उसकी गाह नहीं
मेरे भाई इस दुनिया में
कुछ चीज़ें हैं अजब बड़ी

जो बहु माँ का घर छोड़ के आयी
उसे दिए क्या क्या ताना नहीं
ये न सोचा वो भी बच्ची है
हर बात में दिखी कमी
मेरे भाई इस दुनिया में
कुछ चीज़ें हैं अजब बड़ी

फिर हड्डी हुई जब बूढी
गृहस्वामिनी की पदवी गयी
गयी बहु के पास भंडार की चाभी
वो अब लक्ष्मी का रूप हुई
मेरे भाई इस दुनिया में
कुछ चीज़ें हैं अजब बड़ी

मास्टर ने कक्षा में पढाना छोड़ा
टयूसन से परीक्षा पास हुई
वही छात्र जब पैर न छुए तो
कहते लड़के को है तमीज नहीं
मेरे भाई इस दुनिया में
कुछ चीज़ें हैं अजब बड़ी

Friday, July 9, 2010

They have got nothing to say ...

When the moon shadows the sun
& Stars are visible in noon
Perplexed wildlife then wonder
How the darkness has returned so soon?


Enlightened & proud we human
Hardly stop to look that way
Solar eclipse- we dismiss lightly
While the confused wildlife calls it a day


But such a difference of perception
Is not only between man and wild
That is why a piece of litter
Captures the fantasy of a child


A benign scolding from the father
Sometimes alienates a boy
The malign tobacco & alcohol
Become the preferred source of joy


When the easier way is preferred
Over the way that is right
When the justice becomes a mistress
Of people with money or might


Blind & deaf become of most men
So words of rest few are lost away
& When they stopped talking others thought
They have got nothing to say.

Tuesday, June 22, 2010

The Old Man & The Priest

Everyone was gathered in the moment of great loss
Always there she was & suddenly vanished right across
Family, friends and neighbours – all present to mourn
Silent was the old man while the priest did sermon


For so long we were together & now you are gone
So acute a loneliness I have never known
You could’ve stayed a little longer, or taken me along
The old man was wondering - did he do something wrong


Life is ephemeral; let the peace be with her soul
Don’t mourn since from heaven, she is watching you all
In the company of God her soul will be just fine
Cursed is the life – priest said – while she joins the divine


God is lucky because now he is under her care
No wonder life is cursed when she is no more here
I don’t need philosophy O’ priest- said the old man
Leave me alone in my grief and recover if I can


In the arms of the God is peace, the priest has always thought
Religion leads to salvation, which everyone anxiously sought
Always the man of action, the old man never prayed
Has seen and suffered a lot in his life, people around him said




If salvation is with God then I don’t want any of it
The God who watches silently while homes of innocent are lit
What is he doing when there is so much injustice around?
People being killed everywhere & freedom buried in ground


Long back when I was in war, I killed many to survive
To salvage so many lives then, no God did arrive
So far never needed a prayer, why insist at this stage
To a free soul of a man, religion is nothing more than a cage


My religion is my conscience, my promise are my words
I am lion who moves alone not a sheep to move in herds
When the stick of religion is wielded by shepherds known as priest
The human sheep then flock together and are led into the mist


With such thoughts you are doomed fellow – said priest with a sigh
How ignorant to doubt religion & God so reverend so high
To blame God for wrongs in world can never be an excuse
Still God forgives you no matter how much you accuse


Forgiveness is what you always talk of, what else can you do?
You don’t have any other option I have seen you through
Impotent are the human sheep & you preach pride for their shame
Hence forgiveness becomes a virtue & vengeance is to blame


Many sheep you may find in humans, but also there will be a real man
Who never seeks solace in blasphemy & doesn’t believe in divine plan
Religion is for those – said old man - who betray their soul
After their sins casually confess & forget and again repeat it all


Seething with anger - the priest had no words to refute
Never he has heard such arguments & allegations so acute
Human sheep around were confused, silently empathized real men
The old man was silent again while the priest rushed to finish sermon

Wednesday, June 9, 2010

Assurance

“I hope you won’t change”, you said that day

“I know you won’t”, I thought looking away

Feelings must stay the same, we can only hope

For no one can control it or bind it with a rope


Was it planned my dear! That you grew fond of me

Did you order your heart to start beating just for me?

Beyond the scope of mind are the ways of the heart

It happens when it has to, no matter how much you were alert


Two hearts meet & spark erupts, even before they realize

Some sustain for a lifetime, while some see early demise

Some hearts remain unquenched, as the spark was one-sided

They wait & they hope, someday it may be reciprocated


That was also a change, which brought us together

The change we are thankful for & cherish forever

Why to be afraid then, that it might become worse

If we are accepting the favourable then why deny adverse


Never planned to fall in love, but eventually I failed

I tried to resist it all, but dictates of heart prevailed

The day might come again, when the heart will dictate

Equally helpless I will be then, seeing you suffocate


Even though you are afraid that the feelings might change?

It is difficult to assure you since our hearts are strange

I can’t guarantee anything, only this much I will say

Your well-wisher forever, whether near you or away.

Saturday, May 29, 2010

Summers in 2010

First year over, three terms gone

Summers time suddenly has come

Two months of real life exposure

Far away from the academic torture

Relief from the campus in wild

Lots of fun & workload mild


Three things to look for in a company

Brand, Profile & Stipend

My company did not have any

& My sorrow knew no end

The game is over, my chance gone

Sulking there I was all alone


Why me & always me – cursing the fate

Trying to act normal I entered the gate

The office & residence at the same place!

It was really hard to keep a straight face

No AC, no coolers, only ceiling fan!

Trust me I was trying as hard as I can


Introduction, pleasantries & some gyan

First day was for just discussions of plan

I also got title for my so-called project

Took it silently, while my heart did object

In the name of marketing, I was making cold calls

So much for learning & claims such tall


Within a week, the whole thing was clear

If you wanna survive, then learn to bear

Life is full of things – good and bad

No point in sulking & feeling sad

Things will change for you some day

When for you everything will make the way


Then I decided to just chill & relax

Not always one can afford to be lax

Enjoy the freedom & explore new place

After this leisure, life is going to be a race

If you look for some positives, the same you will find

To learn anywhere is sign of a keen mind


Then I decided to count my other gains

Ignoring for a while all professional pains

Here I have made some friends new

Such a gem as heart I have seen few

So much enriching was the personal experience

Professional sorrows stopped making any sense


I want to thank everyone & with Prakash I start

Naïve & sweet usually but sometimes a little tart

Deepak my roommate loves by heart music & dance

Carefree attitude always & songs put him into a trance

A wonderful person like Deepthi is really hard to find

Very caring & co-operative, sting operation in her mind


Richa was the first face I saw and a pretty one no doubt

Mostly happy but a little anxious & ready to help you out

Sanjeevani is the “chutki” with innocent and smiling face

Always laughing & looking forward, bearing troubles with grace

The workaholic enigma- Kanchan is an observer silent & keen

Bottled up is a lot inside, nicely hides what she has been


The bride to be & my full time adversary- its Shruti

Who taught me sign language for Thumbs Up & Frooti

Memories we have a lot to treasure and to cherish

Kritarth, Minj, Pradeep Sir & the new groom Manish

Everyone else in the office who are senior & mature

Pardon me since I was unable to know you more


The chat over coffee with Amit Sir and lake as a view

Some insights into life & sharing experiences old & new

The lectures of senior Raje and the words of Mr. kulkarni

Personality of such types, you won’t find many

Patil madam – a contented mother & very proud

Apte Sir is always working – I can cry out loud


So much to experience & still more to feel

Fulfilled I was from head to heel

Nothing matters a lot in the long run

So stop worrying and just have fun

If the aim you have is visible and clear

Then you will anyways reach it dear.

Monday, May 24, 2010

Next time ?

This time, if not possible

Next time, is there a chance?

Paired with others now though

Together someday shall we dance?


Barriers between us - so many

Family, society, culture & custom

Always thought these won’t matter

However, those we couldn’t overcome


Whether the barriers will vanish

Or multiply many times - I can’t say

Situation favourable or not

Next time I’ll be with you anyway


This time, you are boarding a train

& I came to wish you goodbye

Traveling you are all alone

Destiny is calling & you’ve got to try


Next time, when I come to station

I hope to be at the point it ends

Where you finish your solo travel

And our journey together begins


These are only my thoughts & wish

I haven’t asked what you desire

Arrogance is it, wishing for both of us

Or just desperation to acquire


To acquire an elusive treasure

Which I kept on searching all alone

Or is it actually a deep-rooted fear

Of next time also finding you gone


Foolishly optimist humans are

But that only helps them to bear

The worst nightmares coming true

And the loss of things so dear


When unbearable becomes the pain

All effort to mend it goes in vain

Then we console our innocent heart

Next time things will be right again


I do wonder sometimes whether

Is there a thing such as “next time”?

All the foolish hopes of happy days

Are they even worth a single dime?


I don’t believe there is a next time

What we have got is “now”

The present is our only chance

Try to make most of it somehow

Saturday, May 22, 2010

Thoughts of a patriot

When the wheel of fortune will turn

And the testing time arrive

Destiny will offer the chance

Where only the best can survive

By the strength of their will

& Undying trust on their path

Will I have courage that day?

To plunge into the blood bath


The day my country will call

When sovereignty is at stake

To restore the peace and order

Sacrifice each of us has to make

Soldiers will fight the enemy outside

Visible, deadly and without a face

But families will fight the heart within

To let beloved be lost without a trace


My mother might not let me go

& Sister may try to block the way

My love will remind me the vows

Of being together night and day

Brother will just hug me tight

& Papa will give a silent tearful stare

Without any voice, a deafening plea

But chance to serve motherland is rare.


Don’t doubt their intentions motherland!

For they love me too much

Given a chance they too, will die for you

Without giving any thought as such

Who taught to me to love you above all?

If it were not my mom and dad

Proud they feel for their patriotic blood

Only a thought of loss makes them sad


Even if I decide otherwise

Hardly anything is to gain

Only loss is what I can see

All my treasures lost in vain

My love will see - a coward

& So will family and friends

A traitor- they will say among us

Deeper can be no shame


Could I won heart of the maiden

If not for my loyalty and valour

Can anyone ever feel for a coward?

Unfathomed love with so much fervour

& The reason my siblings look up to me is

My courage, my loyalty & my integrity

So I forsake ordinary life of comfort

And chose martyr’s glory for eternity

Tuesday, May 18, 2010

My words my vow...

My words -my vow, my life is so

Try as much you wish but

You can’t let it go

In the end what matters

Is not who got what

Nor feelings of mine

That I had long ago,

What matters really is

You felt them also

My words -my vow…..


I tried - I failed, in my first hello!

Rehearsed a lot in mind

But outcome – zero

So close she was, my lips quivered

Staring at her, my thoughts flickered

A twitch in my heart when

She held my gaze

Briefly & then turned & went away

Leaving a trail that forever

I was to follow

My words -my vow……


I sang – they laughed, in my first solo

Anticipated an applause but

Pride - I had to swallow

So funny could be - a sincere effort

A boy of nine could never ever know

No feedback no words

Only sound of chuckles

Laughter could hurt so deep, so bad

From that day onwards, I do know

My words -my vow……


I laughed - I played, and fought with pillow

Family n friends always for me

Moment of joy be it or a period of sorrow

They stood by me throughout the journey so long

But somewhere in between I missed the song

Angered I was when could not see them

But blinded I was & thought they were to blame

Now I see and realize what course life went

Repetition of that I will never allow

My words -my vow……

Tuesday, May 11, 2010

O life...

O life! For once talk to me

I am looking for some answers

Members of my family, hordes of my friends

Revered my teachers – so quite & solemn

I tried to ask everyone

What makes us what we are?

Everyone said something

But nobody was very clear

Whatever little they uttered

Hardly made any sense

It lacked precision and clarity

And it lacked coherence


My friends said “Are you mad?”

Right now all such thoughts are bad

This is the time to enjoy, chill and relax

Very soon you will be worrying

About job, bills, rent, loans & tax

This is the time to worry about your looks

Work out for your muscles

& Take leave of your books

Watch movies, play poker & hunt for a date

Such philosophy is not good for you mate!

Ephemeral is youth & too short is life

Take all the bites and relish

While you still have an appetite.


My family did not allow at all

Any such frivolous discussion

Study & career they said

Must be your only mission

Take care of your grades

& Read all the books on the shelf

Get through a good college &

Life will take care of itself

You need to be responsible

Every eye is on you

Competition out there is immense

& Opportunities too few

Kill your desires forget all dreams

Suppress your heart

As much though it screams

Obey us until we are paying your bills

Once you become self-reliant

You will be free & interference will be nil


My teachers were never open to such discussion

Unquestioned obedience they wanted

& Did not appreciate any deviation

Discuss we can only if it is in the syllabus

Anything out of that they said

Hardly serves any purpose

Classroom hours are so less

& Curriculum so vast

Hardly we can do justice

When we have to teach that fast

And if that was not enough

Fate sent us a student like you

Not satisfied by syllabus & asking

Things such radical and new

The things you want to know

Are beyond the scope of class

Don’t dwell on these thoughts too much

My dear! You also need to pass


Every one told me whatever they felt

Answers to my question though, I did never get

I followed what they told me

And I did what they asked

The question somehow lingered

Somewhere deep inside

The target that was set for me

Is now acquired and achieved

My family friends & teachers

Are now very much relieved

But the quest to search deep never died

I wonder how long the answers could hide

So life! I ask you to come and reply

Fulfill my quest that others could not satisfy

What makes me what I am?

I need this to know

However “hard to get” you my play

I will never let it go.

Wednesday, May 5, 2010

Its your birthday…….


I am used to waking up & seeing you everyday

Suddenly I realize my dear! It’s your birthday

Happy I am though, for this special occasion

In my heart I can sense some specs of hesitation

I don’t have words to mark another year’s demise

& I don’t have a gift to take you by surprise


Boxes of chocolates - sweet like you

Pieces of jewelry – just as beautiful

A long silk gown as worn by angels

For your tender wrists a bunch of bangles

A cruise in Mediterranean – with just you around

A leisurely day on beach, we lying idle on ground


A nice sumptuous dinner followed by a ball

You dancing with me despite being coveted by all

Or just staying indoors and me cooking a special supper

Eating in moonlight & watching a romantic flick together

Or may be just a kiss, followed by another and another…

Each getting more passionate, sweeter and more tender


I am not asking you to choose among these

You can have it all and many more if you please

I want to give you all and someday I will for sure

For a lot of my deficiencies, time only is a cure

So bear with my inability, if you can, for today

Soon I promise to put all our hardships away


Big words & no deeds you may think as of now

But believe me someday you will just say “Wow!”

The day is very special and my dear! so are you

Puzzled! how to celebrate now – options I‘ve few

Undecided and confused so far and away

For the time being only this much I will say

Many many happy returns of the day!

Tuesday, April 27, 2010

Those sixty hours.......


In those sixty hours, I found hope again

I loved, I lived and I felt humane

Breaths were not complaining any more

Heart was elated right to the core

Pleasant seemed each sight

Unmatched was my delight

A hint of anticipation on my face

Where smile has left a slight trace


In those sixty hours, we were together

I loved, I lived and I felt better

Holding hands and sitting close

Heart was getting its ample dose

Your lips brushed on the back of my palm

Everything for a moment became so calm

I could hear my own heart pounding

Oblivious of its entire surrounding


In those sixty hours, love was redeemed

Happy I was and my face beamed

I relish your laughter I relish your embrace

I will always remember the lovely smile on your face

We wanted to talk, but initially could not

Time was very less and to say there was lot

Without saying anything you held me so tight

And suddenly everything seemed very much all right


In those sixty hours, dawned a new phase

Captive for so long, the bird was out of cage

It flew to new heights and explored new realms

Reality was slowly converging with dreams

Some complaints and conflicts were also in queue

With so much delight, now some tears were due

You came in those sixty hours and also were gone

But left me enough memories to cherish alone


After those sixty hours when I am not with you

I dream I remember and dear! I miss you

Having known for long the pain of separation

Not letting you go was a strong temptation

But the undeserved and undying faith that you have on me

Prevents me every time from being what seemed my destiny

So I will never stop you when you don’t want to stay

You love me and I love you, that is enough anyway.

Monday, April 26, 2010

Only in my dreams!!!!!

Laughing they were, happier than ever

With firm resolve to be always together

Holding hands & facing the world

Dared to venture far beyond

Anyone had tried to ever

But, Only in my dreams!!!


Each willing to die for other

And if required, to kill too

The thought never crossed their mind

“ I have to live without you”

Everything – each was to other

But, Only in my dreams!!!


Come what may I am with you

Everything can be false, our love is true

The world might change, never will you

You’ll not let me, that too is sure

I know our love is there to endure

But, Only in my dreams!!!!


Now the reality


They say in this world,

There is always a choice

Between the right & the easy

We chose what was not right

And so far it hasn’t been easy


I had my aspirations & so did you

Only both were not same

I had my limitations & so did you

Which we feared to overcome

I was very close & so were you

But one step lesser was our maximum


So, the love was lost & aspirations gone

The dream has turned to ruins

& in that ruins again looking for hope

Seems a distant dream!!!

Thursday, April 8, 2010

The Boy

The harder he tries, the worse it becomes

Such is the fate of an anxious boy

He tries to deliver the best as per his capacity

But the world has set its benchmark high

Undeterred though, he pleads to the world

You set the standards & I will try to match


The boy doesn’t realize that the world is not fair

Its parameters are not uniform & clear

They try to judge on the face value here

Oblivious of the part that hides in the inner

When the surface becomes valuable than the core

Boy is puzzled and remains unsure


When one is not sure, there is no direction

The lack of direction is the way to frustration

That frustration kills the drive within

The lack of drive is bad for ambition

Blinded by the fog of worldly wrongs

Boy is unable to see his own reflection


True to his core, honest to his soul

Boy is not aware of his intact whole

The integrity lightens his face

& Innocence gives him a grace

This defeat of victorious wrong to a loser right

Gives the world a chance to reflect


Unable now to realize though

But someday sure, there will be a ray

That will clear the fog and unveil the way

Burdened by the cognizance, to their dismay

The world that day will yell outright

Boy! You have set the standards & we will try to match.

Wednesday, April 7, 2010

How Can I stop loving u dear !!!!

How can I stop loving you dear !!!

Darling you are very dear

Even after so many years

When many things have faded away

But you are still visible and clear

More ever I have never felt like it

And my heart can always find you near

So how can I stop loving you dear ?



Things do happen – good or bad

Got to accept it – never have a choice

Only problem my dear! Is that

Good seems too short to relish

& Bad too long to bear

& Harsher still to bear alone

will go on facing many such “Bads”

Without any complaint or fear

But I will never stop loving you dear



Two souls meet and unite

And life changes fore ever

Whenever a life brushes with another

Both can never be same ever

What happened to us was that

When we met first, we didn’t realize

When we realized, we couldn’t unite

When we could, you didn’t

Likewise it never did materialize

If only timing was wrong

It will be right some year

Till then I can wait without

Having to stop loving you dear.


Life can be cruel

many times it has shown

But you could be

I have never known

The shock was great and pain too much

Too much to define

But doctors have to inflict pain

In order to heal

Seems what you did might

Be the best way to deal

I realize now that during all this

When I was worse

you were no better

So how can I stop loving you dear ?

Saturday, March 27, 2010

I think it’s not me !!

Although the name is mine & so are the deeds,

Somewhat difficult it is to explain but I feel it’s not me.

I don’t deny my feelings, I don’t deny my sense,

I don’t deny my surroundings, I don’t deny my existence.


Whatever must be said has been said

Whatever must be done has been done.

Only if I could say a little more

And something more could have been done .


These may sound like a regret

These may sound like a sorrow

But these words don’t capture the gist

May be some new words I need to borrow


Life is defined by the choices we make

We become what we think

With so much in our own hands

We still end up wondering


This is not what I asked for

This is not what I meant

Even though conscious of my every doing

I feel however, it isn’t me.