Thursday, September 30, 2010

रेस्तरां में एक शाम

जिंदगी की मेनू से एक दोस्त आर्डर किया था
और कहा था वेटर से, गुस्सा थोडा कम डालना

ईर्ष्या रत्ती भर भी नहीं, मगर भरोसा हो भरपूर
समझदारी का स्वाद हो और जो जाने थोडा मुस्कुराना

कुछ समय भी हो मेर लिए, और जायका भी वफादारी का
छिछोरा बिलकुल न हो, मस्ती के मिर्च से फिर छौंक देना

सच्चा जिसका रंग हो, नफरत से थोडा तंग हो
लालच का तेल नहीं, संतोष के घी में उसे पकाना

महत्वाकांक्षा का तत्व हो और बुद्धिमानी का मसाला
अनुभव की धीमी आंच पर उसे धीरे-धीरे सीझाना

पाचन कमजोर होने पर भी जो पेट को ना सताए
अनदेखा करे मेरी कमी को, ऐसा क्षमा का रस मिलाना

मेहनत का नमक हो, ईमानदारी की चमक हो
भाई से जो कम न लगे, ऐसा सुगंध अपनेपन की फैलाना

वेटर मुस्कुराया और बोला, ऐसे आर्डर में तो टाइम लगता है
आजकल जो जल्दी बन जाए, वो मतलब का फास्ट-फ़ूड चलता है

ढोंग की चासनी में सराबोर, ऊपर से प्रपंच की वो छौंक
पोषण रत्तीभर भी नहीं, जिसे खाकर पेट जलता है

बार-बार खाकर भी जिसे बिलकुल भी मन न भरे
कभी लालच की अपच करदे, तो कभी फरेब का डकार बनता है

आर्डर अगर ये ले आऊं तो फास्ट-फ़ूड कभी न खा पाओगे
झुण्ड से भी निकाले जाओगे, यही इसका दाम लगता है

Wednesday, September 29, 2010

आज का "एथिक्स"

सबके सामने बड़ी-बड़ी बातें, लम्बे वादे करते हैं
निभाने के समय मगर कुछ शर्तें नयी ले आते हैं
ढाबे की तरह दाम वसूला, बंटना था भंडारे का भोग
कितने "एथिकल" हैं कुछ लोग......

आश्रय देने का एहसान, किराया पाकर भी दिखाते हैं
अबाधित अधिकार बताकर, नए दायरे निस दिन बनाते हैं
अनिवार्य निमंत्रण का प्रचलन, वो यहाँ बेधड़क चलाते हैं
ऐसे ही तो नहीं वो "एथिकल" कहलाते हैं........

वो कहते तुम नहीं सीखते, हम तो बहुत पढ़ाते हैं
आज की लीक में वो बात, वो जज्बा हम नहीं पाते हैं
इसी कारण अब आधा "लेक्चर", तुमसे ही "प्रेजेंटेसन" करवाते हैं
हर कदम बड़े गर्व से "एथिक्स" को हम अपनाते हैं.....

बिना म्याऊं की उस बिल्ली को, जिसका करती थी दुनिया मान
बना अपाहिज वो समझाते, "चेंज" हुआ ये बड़ा महान
कल चूहे थे शेर उसके आगे, बिचारी अब चूहों से ढेर
"एथिकल" लोगों के "विजन" का ही तो है यह फेर....

पांच "सेंचुरी" से सात "सेंचुरी" पर एक ही "इनिंग" में आते हैं
सात से बीस भी जल्द ही होगा, बड़े गर्व से इतराते हैं
फिर अनदेखा कर सच ही कहते, दूसरों का कष्ट न देखा जाता
आखिर "एथिक्स" से है हमारा बड़ा गहरा नाता.....

पूरा भी जहाँ रहा अधुरा, फिर भी कोई नहीं हैरान
"क्वालिटी" छोड़ "क्वांटिटी" पर जिनका हर पल ध्यान
देंगे नहीं पर बहुत चाहिए, ऐसा सम्मान का व्यापार
बनता है किसी बड़े आदमी के "एथिक्स" का आधार.....

Sunday, September 19, 2010

कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

हथेलियों पर बाकी अबतक उस स्पर्श का आभास
जैसे धुले थाली से आये कल के पकवान की सुवास
आज मगर सूखी रोटी खाकर सो जाना तो होगा
कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

जिन यादों की रंगोली से सजती थी मुस्कान
हवा के झोंके ने बिखराकर सब किया धूल समान
फीकी ही सही, आंधी थमने तक, मुस्काना तो होगा
कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

जिन होठों की ठिठोलियों से गूंजा था आसमान
वो हंसी, वो किलकारी देते थे सपनों को प्राण
सन्नाटे की संगीत पर अब गुनगुनाना तो होगा
कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

जिसका दर्शन अमृत होता, जो चेहरा था भगवान्
प्रेम-पुष्प से पूजन करके प्रेम-प्रसाद का करते पान
अब हुए नास्तिक फिर शून्य से नया पूजन तो होगा
कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

आशा के धुंधले शीशे से जीवन लगता एक वरदान
सच पाषाण ने चूर कर दिया, रहे अधूरे अरमान
शाप, अछूत होने का, अरमानों को निभाना तो होगा
कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

दोस्ती में यारों..............

दोस्ती में यारों हमसे गलती न हुयी ऐसी भी बात नहीं
मंशा तो बुरी न थी मगर बात उभरी तो थोड़ी गलत लगी
खुद छोटे न हो जाएँ इस कारण नहीं मेरी चुप्पी
मन मचला बहुत पर एक बात से बंद रही जुबान मेरी
माफ़ी अगर मांग लेते तो क्या दोस्ती न छोटी होती जाती ?
दोस्ती में यारों हमसे गलती न हुयी ऐसी भी बात नहीं

अब साथ न रहना खाना होता, रोज नहीं हम मिल पाते
एक ही शहर में रहते हैं फिर भी घंटों बात न कर पाते
फिर भी एक झलक को पाकर मन इतना निश्चिन्त हुआ
दोस्त तुम यहाँ हो जान कर अपने मन को हम समझाते
रिश्ता तो वही गहरा है जिसे निभाने की हो फ़िक्र नहीं
दोस्ती में यारों हमसे गलती न हुयी ऐसी भी बात नहीं


बचपन बीता, पढाई छूटी, बीत गए वो साल
स्कूल के बस्तों से भारी अब कन्धों पर जो भार
अब कहाँ गली के खेल तमाशे खो गया है वो संसार
चाहकर भी टिकने न देता समय का ये तेज प्रवाह
बह चले अलग दिशा तो क्या आगे संगम की आस रही
दोस्ती में यारों हमसे गलती न हुयी ऐसी भी बात नहीं

My Favourites - Dr Kumar Vishwas(4)

मै तुम्हें ढूंढने...........


मै तुम्हें ढूंढने स्वर्ग के द्वार तक
रोज जाता रहा रोज आता रहा
तुम ग़ज़ल बन गयी गीत में ढल गयी
मंच से मैं तुम्हे गुनगुनाता रहा

जिंदगी के सभी रास्ते एक थे
सब की मंजिल तुम्हारे चयन तक रही
अब प्रकाशित रहे पीड़ के उपनिषद
मन की गोपन कथाएं नयन तक रही
प्राण के पृष्ट पर प्रीति की वर्तनी
तुम मिटाती रही मैं हनाता रहा
मै तुम्हें ढूंढने...........

एक खामोश हलचल बनी जिंदगी
गहरा ठहरा हुआ जल बनी जिंदगी
तुम बिन जैसे महलों में बीता हुआ
उर्मिला का कोई पल बनी जिंदगी
वृष्टि आकाश में आस का एक दीया
तुम बुझाती रही मैं जलाता रहा
मै तुम्हें ढूंढने............

My Favourites - Dr Kumar Vishwas(3)

मांग की सिन्दूर रेखा.......


मांग की सिन्दूर रेखा तुमसे ये पूछेगी कल
यूँ मुझे सरपर सजाने का तुम्हे अधिकार क्या है ?
तुम कहोगी वो समर्पण बचपना था तो कहेगी
गर वो सबकुछ बचपना था तो कहो फिर प्यार क्या है ?
मांग की सिन्दूर रेखा.......

कल कोई अल्हर अयाना बावरा झोंका पवन का
जब तुम्हारी इंगितों पर गंध भर देगा चमन में
या कोई चन्दा धरा का रूप का मारा बेचारा
कल्पना के तार से नक्षत्र जड़ देगा गगन पर
तब यही बिछुआ महावर चूड़ियाँ गजरे कहेंगे
इस अमर सौभाग्य के श्रृंगार का आधार क्या है ?
मांग की सिन्दूर रेखा......


कल कोई दिनकर विजय का सेहरा सर पर सजाये
जब तुम्हारी सप्तवर्णी छांह में सोने चलेगा
या कोई हारा थका व्याकुल सिपाही जब तुम्हारे
वक्ष पर धर शीश लेकर के हिचकियाँ रोने चलेगा
जब किसी तन पर कसी दो बाँहें जुड़कर पूछ लेंगी
इस प्रणय जीवन समर में जीत क्या है हार क्या है ?
मांग की सिन्दूर रेखा........

My Favourites - Dr Kumar Vishwas(2)

मैं भाव सूचि उन भावों की...........

मैं भाव सूचि उन भावों की, जो बिके सदा ही बिन तोले
तन्हाई हूँ हर उस ख़त की, जो पढ़ा गया है बिन खोले
हर आंसू को हर पत्थर तक पहुंचाने की लाचार हूक
मैं सहज अर्थ उन शब्दों का जो सुने गए हैं बिन बोले
जो कभी नहीं बरसा खुलकर, हर उस बादल का पानी हूँ
लव-कुश की पीड़ बिना गायी, सीता की रामकहानी हूँ

जिनके सपनों के ताजमहल बनने से पहले टूट गए
जिन हाथों में दो हाथ कभी आने से पहले छूट गए
धरती पर जिनके पाने और खोने की अजब कहानी है
किस्मत की देवी मान गयी पर प्रणय देवता रूठ गए
मैं मैली चादर वाले उस कबीरा की अमृत-वाणी हूँ
लव-कुश की पीड़ बिना गायी, सीता की रामकहानी हूँ

कुछ कहते हैं मैं सीखा हूँ अपने जख्मों को खुद सीकर
कुछ जान गए मैं हँसता हूँ भीतर भीतर आंसू पीकर
कुछ कहते हैं मैं हूँ विरोध से उपजी एक खुद्दार विजय
कुछ कहते हैं मैं रचता हूँ खुद में मरकर खुद में जीकर
लेकिन मैं हर चतुराई की सोची समझी नादानी हूँ
लव-कुश की पीड़ बिना गायी, सीता की रामकहानी हूँ

My favourites - Dr. Kumar Vishwaas (1)

हार गया तन मन .........


हार गया तन मन पुकार कर तुम्हे
कितने एकाकी हैं प्यार कर तुम्हे

जिस पल हल्दी लेपी होगी तन पर माँ ने
जिस पल सखियों ने सौपी होगी सौगातें
ढोलक की थापों में, घुंघरू की गुनझुन में
घुलकर फैली होगी घर में प्यारी बातें
उस पल मीठी सी धुन सूने कमरे में सुन
रोये मन चौसर पर हार कर तुम्हे
कितने एकाकी हैं प्यार कर तुम्हे

कल तक जो हमको तुमको मिलवा देती थी
उन सखियों के प्रश्नों ने टोका तो होगा
साजन के अंजुरी पर अंजुरी कांपी होगी
मेरी सुधियों ने रास्ता रोका तो होगा
उस पल सोचा मन में आगे अब जीवन में
जी लेंगे हसकर बिसार कर तुम्हे
कितने एकाकी हैं प्यार कर तुम्हे

कल तक जिन गीतों को तुम अपना कहती थी
अखबारों में पढ़कर कैसा लगता होगा
सावन की रातों में साजन की बांहों में
तन तो सोता होगा पर मन जगता होगा
उस पल के जीने में आंसू पी लेने में
मरते हैं मन ही मन मार कर तुम्हे
कितने एकाकी हैं प्यार कर तुम्हे

( कवि - डॉक्टर कुमार विश्वास )

Friday, September 3, 2010

इस दुनिया में

मेरे भाई इस दुनिया में
कुछ चीज़ें हैं अजब बड़ी
सोमवार को प्रेम से खाया
मंगल को नॉन-वेज पाप बनी

एक माँ-बाप ने सबको पाला
माथे पे कोई शिकन नहीं
उसी एक माँ-बाप का जिम्मा
सब बच्चों की बला बनी
मेरे भाई इस दुनिया में
कुछ चीज़ें हैं अजब बड़ी

जो अनुभव देते पालक को
खुद के लिए उसकी आस नहीं
अपना लाल तो सिखाया मानेगा
जो दिखाया उसकी गाह नहीं
मेरे भाई इस दुनिया में
कुछ चीज़ें हैं अजब बड़ी

जो बहु माँ का घर छोड़ के आयी
उसे दिए क्या क्या ताना नहीं
ये न सोचा वो भी बच्ची है
हर बात में दिखी कमी
मेरे भाई इस दुनिया में
कुछ चीज़ें हैं अजब बड़ी

फिर हड्डी हुई जब बूढी
गृहस्वामिनी की पदवी गयी
गयी बहु के पास भंडार की चाभी
वो अब लक्ष्मी का रूप हुई
मेरे भाई इस दुनिया में
कुछ चीज़ें हैं अजब बड़ी

मास्टर ने कक्षा में पढाना छोड़ा
टयूसन से परीक्षा पास हुई
वही छात्र जब पैर न छुए तो
कहते लड़के को है तमीज नहीं
मेरे भाई इस दुनिया में
कुछ चीज़ें हैं अजब बड़ी