Sunday, September 19, 2010

कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

हथेलियों पर बाकी अबतक उस स्पर्श का आभास
जैसे धुले थाली से आये कल के पकवान की सुवास
आज मगर सूखी रोटी खाकर सो जाना तो होगा
कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

जिन यादों की रंगोली से सजती थी मुस्कान
हवा के झोंके ने बिखराकर सब किया धूल समान
फीकी ही सही, आंधी थमने तक, मुस्काना तो होगा
कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

जिन होठों की ठिठोलियों से गूंजा था आसमान
वो हंसी, वो किलकारी देते थे सपनों को प्राण
सन्नाटे की संगीत पर अब गुनगुनाना तो होगा
कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

जिसका दर्शन अमृत होता, जो चेहरा था भगवान्
प्रेम-पुष्प से पूजन करके प्रेम-प्रसाद का करते पान
अब हुए नास्तिक फिर शून्य से नया पूजन तो होगा
कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

आशा के धुंधले शीशे से जीवन लगता एक वरदान
सच पाषाण ने चूर कर दिया, रहे अधूरे अरमान
शाप, अछूत होने का, अरमानों को निभाना तो होगा
कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा

4 comments:

  1. yaar kya kahu... feeling are expressed amazingly..
    कल जैसा आज नहीं है तो आज जैसा कल फिर क्यों होगा... waah.. do visit my blog.. :)

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  2. thx a lot. i sure will visit your blog. i don't know how my blogs have started attracting visitors suddenly. it was almost untouched so far.

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  3. This comment has been removed by the author.

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  4. i think credit goes to chittajagat :)

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