Sunday, September 19, 2010

दोस्ती में यारों..............

दोस्ती में यारों हमसे गलती न हुयी ऐसी भी बात नहीं
मंशा तो बुरी न थी मगर बात उभरी तो थोड़ी गलत लगी
खुद छोटे न हो जाएँ इस कारण नहीं मेरी चुप्पी
मन मचला बहुत पर एक बात से बंद रही जुबान मेरी
माफ़ी अगर मांग लेते तो क्या दोस्ती न छोटी होती जाती ?
दोस्ती में यारों हमसे गलती न हुयी ऐसी भी बात नहीं

अब साथ न रहना खाना होता, रोज नहीं हम मिल पाते
एक ही शहर में रहते हैं फिर भी घंटों बात न कर पाते
फिर भी एक झलक को पाकर मन इतना निश्चिन्त हुआ
दोस्त तुम यहाँ हो जान कर अपने मन को हम समझाते
रिश्ता तो वही गहरा है जिसे निभाने की हो फ़िक्र नहीं
दोस्ती में यारों हमसे गलती न हुयी ऐसी भी बात नहीं


बचपन बीता, पढाई छूटी, बीत गए वो साल
स्कूल के बस्तों से भारी अब कन्धों पर जो भार
अब कहाँ गली के खेल तमाशे खो गया है वो संसार
चाहकर भी टिकने न देता समय का ये तेज प्रवाह
बह चले अलग दिशा तो क्या आगे संगम की आस रही
दोस्ती में यारों हमसे गलती न हुयी ऐसी भी बात नहीं

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