Sunday, September 19, 2010

My favourites - Dr. Kumar Vishwaas (1)

हार गया तन मन .........


हार गया तन मन पुकार कर तुम्हे
कितने एकाकी हैं प्यार कर तुम्हे

जिस पल हल्दी लेपी होगी तन पर माँ ने
जिस पल सखियों ने सौपी होगी सौगातें
ढोलक की थापों में, घुंघरू की गुनझुन में
घुलकर फैली होगी घर में प्यारी बातें
उस पल मीठी सी धुन सूने कमरे में सुन
रोये मन चौसर पर हार कर तुम्हे
कितने एकाकी हैं प्यार कर तुम्हे

कल तक जो हमको तुमको मिलवा देती थी
उन सखियों के प्रश्नों ने टोका तो होगा
साजन के अंजुरी पर अंजुरी कांपी होगी
मेरी सुधियों ने रास्ता रोका तो होगा
उस पल सोचा मन में आगे अब जीवन में
जी लेंगे हसकर बिसार कर तुम्हे
कितने एकाकी हैं प्यार कर तुम्हे

कल तक जिन गीतों को तुम अपना कहती थी
अखबारों में पढ़कर कैसा लगता होगा
सावन की रातों में साजन की बांहों में
तन तो सोता होगा पर मन जगता होगा
उस पल के जीने में आंसू पी लेने में
मरते हैं मन ही मन मार कर तुम्हे
कितने एकाकी हैं प्यार कर तुम्हे

( कवि - डॉक्टर कुमार विश्वास )

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