Friday, October 15, 2010

और न कोई होगा

कौन करेगा हंसकर तुमसे, घंटों फ़ोन पर बात
रिंग होते ही दौड़ पड़ेगा, दिन हो या हो रात
आठवीं बार भी उस किस्से को, सुनके जो न चिढेगा
वो तो बस, मैं ही था और न कोई होगा

कौन पढ़ेगा सांस रोककर, ख़त को तुम्हारे यार
फिर अगले की बेसब्री में, जब टोकेगा दस बार
तब डाकिये की झिड़क से भी, जिसका मन न दुखेगा
वो तो बस, मैं ही था और न कोई होगा

कौन हंसेगा बिना बात के, याद अगर कुछ आये
उस दो पल की तफरी पर, जो घंटों तक मुस्काए
मनचाहा कुछ न भी हो तो, एक शब्द न कहेगा
वो तो बस, मैं ही था और न कोई होगा

कौन रहेगा खोया इसमें, कि कैसे तुम्हें हंसाएं
आज जो सर ने गुड बोला, मौका पाकर तुम्हें बताएं
तुमको ही सब देकर भी, तुम्हारा एहसान कहेगा
वो तो बस, मैं ही था और न कोई होगा

Thursday, October 14, 2010

चुप ही फिर रह जाना

क्षमा मांगना तभी सखे जब हुयी हो भूल अचानक
सोच-समझके किया हो जो, तो चुप ही फिर रह जाना

पीछे से कुछ बोलना मत चर्चा अगर हो मुझपर
नजर मिलाके बात किये हो गया है एक जमाना

न आना हो तो न आना, हम मन को समझा लेंगे
आकर चले जाने से बदनाम होता है अपना फ़साना

ऐसे तो सब ही चलते हैं, फर्क क्या तुझमें मुझमें
तुझे चाहिए थी मंजिल मुझे बस तेरा साथ था पाना


तेरी मर्जी तो मेरी मर्जी, मेरी मर्जी भी रही मेरी
बहलाने को दिल को और मिलता न कोई बहाना 


रंजिश है अब हर पल मन में, दोस्त कहाँ फिर आयें
अपनों के लिए अब दिल में रहा न कोई ठिकाना

Monday, October 11, 2010

इस कारण डूब नहीं पाया

मुझको इश्क के दरिया तक तो तेरी याद ने पहुँचाया
हल्का हुआ जो दिल खोकर, इस कारण डूब नहीं पाया

तुम जो मेरे साथ नहीं तो, यह भी मर्जी मेरी है
क्यूँ घबराना यह तो बस, दो-चार जन्मों की देरी है
गर सात जनम भी बीत गए तो, न होगी कोई व्याकुलता
चाँद से जो मिले हों उनके लिए न रात अंधेरी है

तुम्हारी मर्जी और मेरी मंशा में कभी कोई अंतर था
तुमने कभी न जाहिर की और मैं भी जान नहीं पाया
हल्का हुआ जो दिल खोकर...............

लोग कहीं कुछ पूछ ही लें तो, कुछ बोले न बनता है
कभी सामने आ जो गए तो, मन मेरा ये डरता है
कैसे तुमसे बात करेंगे, आँखें फेर न पाएंगे
वो आलिंगन अब नहीं संभव, मन कहाँ ये समझता है

साँसों से छू सकते फिर भी, होगी सदियों की दूरी
आँखों से बस टटोलते थे, शब्द कहाँ कोई बन पाया
हल्का हुआ जो दिल खोकर...............

अब तो मेरी ये उदासी, मेरे साथ ही रहती है
सुन न पाए, दूजा कोई, चुपके-चुपके कहती है
होता न कोई तुमसे बढ़कर, इस जग में मेरे पास
इक लड़की कुछ दिन से मगर, एक नाम नहीं लेती है

दो ही चीज मेरे, पास थे उनके, इक हंसी इक जान
वो लौटना भूल गए और मैं भी मांग नहीं पाया
हल्का हुआ जो दिल खोकर............

Sunday, October 10, 2010

टिकता नहीं जरा भी.......

हुए लथपथ जो खून से तो याद अचानक आया
कोई कहता था मुझपर लाल रंग बहुत फबता है

टिकता नहीं जरा भी फिर घाव भरे ये कैसे
कमबख्त वक़्त का मरहम चलता चला जाता है

अपने सुकून की खातिर जिसे दूर किया था तुमने
कभी सुनते जब वही नाम तो क्यों सुकून चुभता है

गंगा की वो बड़ी धार जिसे कभी डिगा न पाई
गालों पर गीली लकीरों में, वो असहाय बहता है

पढ़-लिखकर भी खा गए हम सच्चाई से मात
दुनियादारी का पाठ कहाँ किसी किताब में मिलता है

एक अरसा बीत गया अब साफ़ करो इस दिल को
महीने में इक बार तो ये चाँद भी धुलने जाता है

जो कम है उसका मोल बहुत, जो बहुतायत वो कौड़ी
सागर कितना खारा, नदी में मीठा जल बहता है

Saturday, October 9, 2010

स्याही के दो बूँद

एक ही जगह बने, एक ही डिबिया में भरे गए
अक्षर बनने को तत्पर, दो बूँद स्याही के विदा हुए
एक ही तत्व, एक ही रंग, बचपन से सदा रहे संग
कितना अच्छा हो यदि, एक ही शब्द के बने अंग
अंकित होकर एक पृष्ठ पर, यह साथ अमर हो जाएगा
दो अलग वर्ण, अपूर्ण मगर, मिलकर एक अर्थ नया दे जाएगा
मन में ही यह बात थी, अभी स्वर भी न उसे मिल पाया था
पर दूर कहीं चौंका एक स्वप्न, और नियति थोडा मुस्काया था

डिबिया खुली, मुहूर्त बनी, दोनों बढे-चले हँसते गाते
कितने अबोध, क्या ज्ञात उन्हें, हर स्याही शब्द न बन पाते
लिखने से पहले कभी-कभी, जब कलम झाड दिए जाते हैं
फिर सबसे उत्सुक हो आगे जो, वो बूँद धुल बन जाते हैं,
नयी परिभाषा रचने को, एक शब्द बनना था जिनका धाम
पर एक गिरा झड़कर नीचे, दूसरा पृष्ठ पर बना पूर्ण-विराम
एक धुल बना, एक अर्थहीन, दोनों का मन भर आया था
नीले स्याही से टपके थे पर उसे लाल नियति ने पाया था

जो डिबिया से ही थे सीधे गिरे, वो बूँद जरा झल्लाते थे
अपनी गाथा उन्हें सुना, उनको वे समझाते थे
शब्द रचने वाले नोक-देव, जो कलम मंदिर में स्थापित हैं
उन्हें सिक्त करने की चाह लिए, हम भी तीर्थ पर थे निकले
पर देव-दर्शन से पहले ही, धरती ने सब रस सोख लिया
तुम्हे विलाप का अधिकार नहीं, जब आये नोक सिंचित करके
अब धुल बने या बने चिन्ह, ये सब तो है बस एक माया
हुआ स्तब्ध बूँद, रो पड़ा स्वप्न, अट्टहास नियति ने फिर लगाया