Sunday, October 10, 2010

टिकता नहीं जरा भी.......

हुए लथपथ जो खून से तो याद अचानक आया
कोई कहता था मुझपर लाल रंग बहुत फबता है

टिकता नहीं जरा भी फिर घाव भरे ये कैसे
कमबख्त वक़्त का मरहम चलता चला जाता है

अपने सुकून की खातिर जिसे दूर किया था तुमने
कभी सुनते जब वही नाम तो क्यों सुकून चुभता है

गंगा की वो बड़ी धार जिसे कभी डिगा न पाई
गालों पर गीली लकीरों में, वो असहाय बहता है

पढ़-लिखकर भी खा गए हम सच्चाई से मात
दुनियादारी का पाठ कहाँ किसी किताब में मिलता है

एक अरसा बीत गया अब साफ़ करो इस दिल को
महीने में इक बार तो ये चाँद भी धुलने जाता है

जो कम है उसका मोल बहुत, जो बहुतायत वो कौड़ी
सागर कितना खारा, नदी में मीठा जल बहता है

1 comment:

  1. अपने सुकून की खातिर जिसे दूर किया था तुमने
    कभी सुनते जब वही नाम तो क्यों सुकून चुभता है
    really touching lines :)

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