Tuesday, November 30, 2010

माँ !


सामने तेरे जब भी आऊं, खुद को बच्चा ही पाता माँ !
बड़ा होने का ढोंग मगर, क्यूँ सब से करना पड़ता है  
मंदिर न जाने पर मुझको, हर कोई नास्तिक कहता माँ !
पर तेरे पैर जो छूता हूँ, तो क्यूँ न कोई समझता है

जब मुझको अक्षर-ज्ञान कराया, तब तुम ब्रह्मण का रूप थी,
लड़ना बुराई से जो सिखाया, तो वो क्षत्रियता की धुप थी,
वणिक गुण ही उसे जानूं मैं, चवन्नी तक का हिसाब मिलाना,
शुद्र कर्म से अलग वो कैसे, मुझको सुबह नहलाना-धुलाना,

            हम सबमें चारों वर्ण का लक्षण, तुझसे ही मैंने सीखा माँ !
            सदियों पुराना गलत विभाजन, आज भी पर क्यूँ चलता है
            मंदिर न जाने पर मुझको, हर कोई नास्तिक बोले माँ !
            पर तेरे पैर जो छूता हूँ, तो क्यूँ न कोई समझता है


मेरा हिस्सा सबसे पहले, मेहमान जब भी लाये मिठाई,
कुर्सी पंखा मेरे जिम्मे, दिवाली में जब घर की सफाई,
मेरे लिए रोज बचाकर, गुड़ के साथ मलाई खिलाना, 
मीठी सी उस झिड़क के संग, कभी कभी झापड़ भी लगाना,

             रूचि और अरुचि वो मेरी, बिन बोले तुमको मालूम माँ !
             कुछ तो खुद भी भूल गया मैं, तुम्हें ही बताना पड़ता है
             मंदिर न जाने पर मुझको, हर कोई नास्तिक बोले माँ !
             पर तेरे पैर जो छूता हूँ, तो क्यूँ न कोई समझता है

नमक लेने उस दिन जो निकली, ये क्यों नहीं बताया था 
छुट्टे देख लड्डू खाने को, मैं कितना रोया था चिल्लाया था 
एक न मानी तेरी फिर भी, आशीर्वाद ही देती तू 
सब बोलें सिरचढ़ा मुझे पर, अच्छा-प्यारा ही कहती तू 

                  उलझन गहरे इतने मन में, फिर भी कुछ नहीं जताती माँ !
                  तुच्छ दुःख हर बार ये मेरा, पर तेरे ही आगे उमरता है 
                  मंदिर न जाने पर मुझको, हर कोई नास्तिक बोले माँ !
                  पर तेरे पैर जो छूता हूँ, तो क्यूँ न कोई समझता है

थककर चूर जब सोने जाता, पैरों में वो तेल की मालिश 
तौलिये से बालों को सुखाना, स्कूल से आते जो हुई थी बारिश 
बचपन में बड़े होने का, वो जिद कितना बचकाना था 
आज जाके जो जाना मैं, तूने तब से पहचाना था   

               चिडचिडा हूँ अभी भूख के कारण, बस तू ही ये समझे माँ !
               दृष्टि क्षय हो जाने पर भी, मुझसे ज्यादा तुझे दिखता है 
               मंदिर न जाने पर मुझको, हर कोई नास्तिक कहता माँ !
               पर तेरे पैर जो छूता हूँ, तो क्यूँ न कोई समझता है

Tuesday, November 16, 2010

विरोध

हेय दृष्टि से देखते हो, कि हर क्षेत्र में वो आ जाते हैं
खुद का भी तो एक घर होगा, क्यूँ वहां नहीं रह पाते हैं
अपने घर से दूर मगर, मनुज इच्छा से क्या जाता है
बस बच्चे भूख से रोयें तो, एक पिता देख नहीं पाता है

घर छोड़ निज इतने दूर जाना, यदि इतना ही आसान होता
क्यूँ फिर तुम्हारे ही आँगन में, मजबूर हो किसान कोई जान देता
निज कुटुंब को ही निभाने को, वो क्रूर जीवन जी लेते हैं
बस आधी-पेट भरने को फिर, अपमान-शोषण पी लेते हैं

लाचार कमजोर और बेबस जो, उनपर ही जोर दिखाते हो
यदि इतना ही दम है तो फिर, पैसेवालों को क्यूँ न भगाते हो
झुण्ड बनकर जो आते हो, और अकेले निरीह को करते ढेर
अपने गली में पर भूलना मत, कुत्ता भी बन जाता है शेर

हमारे घर के कायर कुछ, ऐसे भी तुम्हारे घर बसते हैं
झुठलाकर अपने नाते को जो, फीकी हंसी सबके संग हँसते हैं
उनको भी यदि तुम मारोगे, सह न चुपचाप सहेंगे हम
एक अंग बीमार हुआ तो क्या, काटकर न फेंक सकेंगे हम

न मानोगे तुम पर कभी कभी, हमारे घर भी मेहमान आते हैं
तुम्हारे दिए सत्कार को वो सुन, लज्जा से शीश झुकाते हैं
कुल के कपूत दो-चार मगर, हर घर में ही हो जाते हैं
कुछ पशुओं का चारा खा गए, तो कुछ शहीदों के घर को चुराते हैं

नाव से आये थे जब वो, चंडाल विनाश मचाने को
हर घर से दौड़े थे सब, तुम्हारे घर को फिर बचाने को
हर आँख से अश्रु गिरा उस दिन, हर घर ने मातम मनाया था
तब बिल में छुप गए थे क्यों, क्यूँ विरोध नहीं जताया था

उपेक्षा कर जो हँसते हो, उनकी लाचारी से होकर अनजान
निष्कर्ष उनकी चुप्पी का पर, ये न लेना कि वो हैं नादान
जिस दिन वो आह सुनोगे तुम, स्थिर खड़े नहीं रह पाओगे
सहोदर के अंतर्मन को देख, स्वयं भी अश्रु बहाओगे

तेरा घर मेरा घर क्यों कर, जब सारा मोहल्ला अपना है
जिनको तुम देखा करते हो, हम सबका वैसा ही सपना है
दूजे के आँगन को भी गर, एक दीप कभी जगमगाता है
क्यूँ किया पराया घर रोशन, सोच कभी नहीं पछताता है

सिर्फ मेरे घर कि बात नहीं, तुम्हारा भी तम से नाता है
ये माना जल्दी दिखे नहीं, बाहरी चकाचौंध में छुप जाता है
पर अन्दर जाकर जो देखेंगे, इक भयावह जर्जर सत्य वहाँ
उत्सव-आत्महत्या इक संग, क्रूर विडंबना ऐसा और कहाँ

एक ही करता बुरा काम मगर, पर नाम सबका आ जाता है
एक ही पापी अपराध करे, पूरे घर पर कलंक छा जाता है
उस पाप से जो तुम्हारा मत नहीं, तो विरोध करो न चुप रहो
बैठा है मोहल्ला यूँ सकदम, कुछ तो कहो ऐसे न सहो

बहुत देर यदि तुम चुप रह गए, सन्देश गलत फिर जायेगा
भाइयों में अविश्वास का फिर, अन्धकार मगर घिर जायेगा
नफरत और घृणा के बलपर, बोलो कहाँ तक जाओगे
रचकर एक और महाभारत, बोलो तुम क्या पाओगे

सौहार्द की बात जो करते हैं, कमजोर समझने की भूल न कर
जल्द अपनों से नहीं झगड़ते हैं, मुर्खता भरी कौतहूल न कर
भाइयों के युद्ध में क्या जाने, कौन जीता किसकी हार है
नैया डुबोके क्या पाओगे अब, जबकि बीच मझधार है

तोड़ने से कभी मिले नहीं, जोड़ने से बढती है ताकत
सम्भावना-सुख जीत की तभी, अपने जब होते हैं निकट
एकता में ही बल है ये, ज्ञानी गुरु सभी समझाते हैं
तुम्हारा छोटू हमारा कप्तान, मिलकर ही तो छक्के छुड़ाते हैं

Sunday, November 14, 2010

ऐसे मगर हम साथ तो हैं



दिखते अलग किनारों की तरह, ऐसे मगर हम साथ तो हैं 
दरिया सूखे तो जानेंगे सब, इक जिस्म के ही दो हाथ तो हैं 


कुछ बोलिए न उनके खिलाफ, वादों को भुलाके जो निकले 
माना कि हम दिखाते नहीं, पर अब भी दिल में जज्बात तो हैं 


मशगुल हुए अब जो इतना, मत सोचना तो सब भूल गए  
दिन रहा यार-व्यापार के नाम, रोने के लिए ये रात तो हैं 


हँसते हैं अब याद आये जो, वो जन्मों संग रहने के वादे 
न बदले हम न बदले तुम पर, बदले हुए ये हालात तो हैं 


जो लेकर एहसान माना था, उधार के उन झूठे सपनों का, 
रो-रोकर अब जो चुकाते हैं, उनके ही ये करामात तो हैं 

Wednesday, November 3, 2010

एक रास्ता सब के लिए तो इस जीवन ने छोड़ा है



बस दो पल का वो अंतर, और वर्षों का अथक प्रयास
पाट न पाया कोई अबतक, सागर बूँद से गया हार
अब न ऐसा सोचेंगे, एक क्षण का मिलन भी थोड़ा है
एक रास्ता सब के लिए तो इस जीवन ने छोड़ा है


हमने जो भी कहा था तुमसे, तुम किसी से न कहना
हर पल जो चुपचाप सहा था, तुम कभी भी न सहना
टूट गयी थी बांध जो मुझसे, जाने में अनजाने में
उन दीवारों से दूर ही, धीरे-धीरे तुम बहना


             सागर दूर हुआ तो क्या, तुम गंगा में ही मिल जाओ
             जो अपना लेता है हंसकर, वहीँ तो सच्चा बसेरा है
             एक रास्ता सब के ................


राम ने जब प्रत्यंचा चढ़ाई, तभी जानकी आई थी
मोहन के मुरली को सुनकर, राधा नहीं रुक पाई थी
देर से ही पर मिली थी ठंडक, उर्मिला की आह को
श्याम का रस जो विष-प्याला में, मीरा नहीं भरमाई थी


            धनुष, बांसुरी, समय, गरल या और भी कोई शर्त हो तो
            पर ज्ञात नहीं कब ख़त्म है मेरा, और कहाँ से शुरू तेरा है
            एक रास्ता सब के ....................

Monday, November 1, 2010

किस आस से

हर बार मिला तो ये सोचा, दोबारा फिर न जायेंगे
पर लगता है कि दिल के साथ, खुदगर्जी भी छोड़ आये हैं

प्यार तुम्हें इतना करते हैं, फिर भी रोक न पाएंगे
किस आस से न जाने फिर, सब से मुह मोर आये हैं

चलते चलते न जाने कब, ऐसे मोड़ पे आ पहुंचे
अपने भी दूर हुआ जाते, और पराये तो पराये हैं

सबने पाया कुछ मुझे छोड़, तो दोष कहाँ तेरा इसमें
किस्मत की ही बात थी, जो बर्फ से भी जलकर आये हैं

तगादे को सब ढूंढ रहे, जब डूबे हैं इतने कर्जे में
ख़ुशी से भी आंसू, हम उधार मांग कर लाये हैं

हँसते हुए जब आये वो, खड़े थे तब अचकाए से
बिछुड़ने का डर कहाँ, जब मिलने से ही घबराये हैं

डूबे जिस घाट वहीँ पीने, फिर से हम तो आ पहुंचे
हँसे दुनिया तो हंसने दो, अब आये हैं तो आये हैं