Monday, November 1, 2010

किस आस से

हर बार मिला तो ये सोचा, दोबारा फिर न जायेंगे
पर लगता है कि दिल के साथ, खुदगर्जी भी छोड़ आये हैं

प्यार तुम्हें इतना करते हैं, फिर भी रोक न पाएंगे
किस आस से न जाने फिर, सब से मुह मोर आये हैं

चलते चलते न जाने कब, ऐसे मोड़ पे आ पहुंचे
अपने भी दूर हुआ जाते, और पराये तो पराये हैं

सबने पाया कुछ मुझे छोड़, तो दोष कहाँ तेरा इसमें
किस्मत की ही बात थी, जो बर्फ से भी जलकर आये हैं

तगादे को सब ढूंढ रहे, जब डूबे हैं इतने कर्जे में
ख़ुशी से भी आंसू, हम उधार मांग कर लाये हैं

हँसते हुए जब आये वो, खड़े थे तब अचकाए से
बिछुड़ने का डर कहाँ, जब मिलने से ही घबराये हैं

डूबे जिस घाट वहीँ पीने, फिर से हम तो आ पहुंचे
हँसे दुनिया तो हंसने दो, अब आये हैं तो आये हैं

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