Tuesday, November 16, 2010

विरोध

हेय दृष्टि से देखते हो, कि हर क्षेत्र में वो आ जाते हैं
खुद का भी तो एक घर होगा, क्यूँ वहां नहीं रह पाते हैं
अपने घर से दूर मगर, मनुज इच्छा से क्या जाता है
बस बच्चे भूख से रोयें तो, एक पिता देख नहीं पाता है

घर छोड़ निज इतने दूर जाना, यदि इतना ही आसान होता
क्यूँ फिर तुम्हारे ही आँगन में, मजबूर हो किसान कोई जान देता
निज कुटुंब को ही निभाने को, वो क्रूर जीवन जी लेते हैं
बस आधी-पेट भरने को फिर, अपमान-शोषण पी लेते हैं

लाचार कमजोर और बेबस जो, उनपर ही जोर दिखाते हो
यदि इतना ही दम है तो फिर, पैसेवालों को क्यूँ न भगाते हो
झुण्ड बनकर जो आते हो, और अकेले निरीह को करते ढेर
अपने गली में पर भूलना मत, कुत्ता भी बन जाता है शेर

हमारे घर के कायर कुछ, ऐसे भी तुम्हारे घर बसते हैं
झुठलाकर अपने नाते को जो, फीकी हंसी सबके संग हँसते हैं
उनको भी यदि तुम मारोगे, सह न चुपचाप सहेंगे हम
एक अंग बीमार हुआ तो क्या, काटकर न फेंक सकेंगे हम

न मानोगे तुम पर कभी कभी, हमारे घर भी मेहमान आते हैं
तुम्हारे दिए सत्कार को वो सुन, लज्जा से शीश झुकाते हैं
कुल के कपूत दो-चार मगर, हर घर में ही हो जाते हैं
कुछ पशुओं का चारा खा गए, तो कुछ शहीदों के घर को चुराते हैं

नाव से आये थे जब वो, चंडाल विनाश मचाने को
हर घर से दौड़े थे सब, तुम्हारे घर को फिर बचाने को
हर आँख से अश्रु गिरा उस दिन, हर घर ने मातम मनाया था
तब बिल में छुप गए थे क्यों, क्यूँ विरोध नहीं जताया था

उपेक्षा कर जो हँसते हो, उनकी लाचारी से होकर अनजान
निष्कर्ष उनकी चुप्पी का पर, ये न लेना कि वो हैं नादान
जिस दिन वो आह सुनोगे तुम, स्थिर खड़े नहीं रह पाओगे
सहोदर के अंतर्मन को देख, स्वयं भी अश्रु बहाओगे

तेरा घर मेरा घर क्यों कर, जब सारा मोहल्ला अपना है
जिनको तुम देखा करते हो, हम सबका वैसा ही सपना है
दूजे के आँगन को भी गर, एक दीप कभी जगमगाता है
क्यूँ किया पराया घर रोशन, सोच कभी नहीं पछताता है

सिर्फ मेरे घर कि बात नहीं, तुम्हारा भी तम से नाता है
ये माना जल्दी दिखे नहीं, बाहरी चकाचौंध में छुप जाता है
पर अन्दर जाकर जो देखेंगे, इक भयावह जर्जर सत्य वहाँ
उत्सव-आत्महत्या इक संग, क्रूर विडंबना ऐसा और कहाँ

एक ही करता बुरा काम मगर, पर नाम सबका आ जाता है
एक ही पापी अपराध करे, पूरे घर पर कलंक छा जाता है
उस पाप से जो तुम्हारा मत नहीं, तो विरोध करो न चुप रहो
बैठा है मोहल्ला यूँ सकदम, कुछ तो कहो ऐसे न सहो

बहुत देर यदि तुम चुप रह गए, सन्देश गलत फिर जायेगा
भाइयों में अविश्वास का फिर, अन्धकार मगर घिर जायेगा
नफरत और घृणा के बलपर, बोलो कहाँ तक जाओगे
रचकर एक और महाभारत, बोलो तुम क्या पाओगे

सौहार्द की बात जो करते हैं, कमजोर समझने की भूल न कर
जल्द अपनों से नहीं झगड़ते हैं, मुर्खता भरी कौतहूल न कर
भाइयों के युद्ध में क्या जाने, कौन जीता किसकी हार है
नैया डुबोके क्या पाओगे अब, जबकि बीच मझधार है

तोड़ने से कभी मिले नहीं, जोड़ने से बढती है ताकत
सम्भावना-सुख जीत की तभी, अपने जब होते हैं निकट
एकता में ही बल है ये, ज्ञानी गुरु सभी समझाते हैं
तुम्हारा छोटू हमारा कप्तान, मिलकर ही तो छक्के छुड़ाते हैं

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