Wednesday, February 16, 2011

तुम तो मेरे दोस्त थे !!!!



रोज संग स्कूल जाते थे, क्या हँसते थे इठलाते थे
टिफिन भी बिना दूजे के, कहाँ कभी हम खाते थे
मुझे चाची की मठरी प्यारी, तुम माँ के हलवे का दीवाना
स्नेह इतना तुम्हारे ऊपर, भाई से कम कभी कहाँ माना
पर उस दिन फटे मेरे जुटे पर, जब सभी मुझे चिढाते थे
भीगी आँखों से गुम खड़ा था, तुम नहीं बचाने आये थे
उस ठिठोली में तुम भी शामिल, उम्मीद मेरा बचकाना था
कि तुम तो मेरे दोस्त थे, तुम्हे मेरा साथ निभाना था !!!


बड़े हुए, कॉलेज अब जाते, स्कूल के दिन बीत गए
टिफिन बॉक्स स्कूल ड्रेस पर, जींस और टी-शर्ट जीत गए
पुराने साथी पीछे रह गए, नयी संगत को अब जाना था
सिनेमा की वो पहली शो, नयी आजादी का ज़माना था
पंक्चर हुई थी साइकिल उस दिन, लौट रहे थे जब मेले से
सब बढ़ गए धराधर आगे, बस खड़े रह गए हम अकेले से
सुनसान सड़क पर उस रात, एहसास फिर वही पुराना था
कि तुम सब मेरे दोस्त थे, ऐसे छोड़ के नहीं जाना था !!!!


इतने साल बीत गए हैं, अब तो रोजी कमाते हैं
हँस लेते लोगों के संग, पर दोस्त अब नहीं बनाते हैं
नहीं ढूंढते संग किसी को, जाते जो कपडे सिलवाने को
बंद कर ली है मुठ्ठी जो, कुछ भी है नहीं गंवाने को
संगी साथी यार दोस्त, संग उठने बैठने भर का नाम
बस दो बातें मीठी कर लेंगे, मौके पर कर देंगे सलाम
चोट खाया मैं फिर सोचूंगा, जैसे वो दिन पुराना था
कि तुम तो मेरे दोस्त थे, तुम्हे दो कदम बढ़ाना था !!!!


कितना भी पा जाऊ, दिल को तो कम ही लगती हैं 
पर कुछ दिनों से अब मेरी उम्मीदें मध्यम रहती हैं  
नहीं रहा जो दोस्त किसीका, शायद भला कुछ कर जाऊ
दोस्ती के नाम पर तो अब, एक डेग और न चल पाऊ
न किसी को अब मौका देता, न खुद को अब भरमाऊंगा
माना थोड़ा मुश्किल है पर, अकेले ही रह जाऊंगा
परछाई भी छोड़ जाती रोज, तो और किसी से क्या कहना 
कि तुम ही मेरे दोस्त हो, हमेशा साथ में ही रहना !!!!

2 comments:

  1. awesome.....par lag raha hai kisi dost se ladai ho gayi ;)

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  2. अच्‍छी लय....शुष्‍क....रूखापन....किंतु रचनात्‍मक....अच्‍छा यत्‍न ।

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