Thursday, September 29, 2011

कौन पूछे मुझे यहाँ ?

कुछ तो हैं प्याला के सेवक, कुछ को मिलती धुंए से राहत
कुछ पैसे की दांव लगते, जोड़ घटा बस हिसाब मिलाते 
कुछ काम में डूबे रहते, कुछ पैसे से पैसे बनाते 
इनमें से एक न मेरा जहाँ, तो फिर कौन पूछे मुझे यहाँ!

कुछ साहब को खुश हैं रखते, तभी तो इ.एम्. आइ हैं भरते 
कुछ नेटवर्किंग के पथ चलते, लोगों से हँस-हँसकर मिलते 
मन के रस्ते चलनेवाले, बेफिक्र काम में ढलने वाले 
ने रखा किसी से मतलब कहाँ, तो फिर कौन पूछे मुझे यहाँ!

सच्चाई का सब हैं रटते, पर मौका पाते ही पीछे हटते
सब तो चाहें एक सितारा, खुद जलकर जो करे उजियारा 
मैंने कहा आओ जलते हैं, घर-घर को रौशन करते हैं 
पर और कोई तैयार कहाँ, तो फिर कौन पूछे मुझे यहाँ!

इसी भीड़ में दिखी खड़ी वो, दिल दिमाग दोनों से बड़ी वो 
पर जो आग मुझे जलाती, एक लपट भी उसे छू न पाती
बड़ा अचम्भा समझ न आया, उसने हाथ भी नहीं बढाया
और कोई चारा भी कहाँ, तो फिर कौन पूछे मुझे यहाँ!

एक परी सी आई थी, एक दुनिया नयी रचाई थी 
हर पल मन से उसे पूज रहा, अंतर्द्वंदों से जूझ रहा 
कैसे इन्हें मैं समझाउं, क्या जताऊं और क्या न बताऊँ 
उनको भी इसकी भनक कहाँ, तो फिर कौन पूछे यहाँ !

Thursday, September 22, 2011

पता नहीं

नौकरी की थी तो पता था, थोड़ा झुकना तो पड़ता है 
पुरे से थोड़ा, थोड़ा ही कम है -नहीं समझ पर पाया था

मिला न चाहा फिर रूठ गए तो, क्या ज्यादती करते हैं?
रोते कुछ इसलिए भी बस, कि जो माँग लिया वही पाया था

संगी-साथी में बरसों से, सच्चा एक यार थे ढूंढ रहे
रातों रात परख नजर की, खाली जेब ने बढ़ाया था

एक से रहता घिरा बराबर, दूजे को अब तक ढूंढ़ रहे 
बुरे भले में बंटी है दुनिया, बचपन में यही पढ़ाया था

सबकुछ रब के हाथ में जो, तो चैन रहे इस दुनिया को
पर भूखे पेट जो सोये तो, किस्मत का खोट बताया था 

Tuesday, September 20, 2011

एक लड़की.......


इक दोस्त, इक पहेली वो 
जितनी चंचल, उतनी अकेली वो
हँस-हँसकर झुठलाती है 
सबकुछ मुझसे छुपाती है

दिल उसका एक दोराहे पर
अनजान है आगे का सफ़र 
अन्दर से बहुत डरी है वो 
फिर भी हिम्मत से खड़ी है वो 

एक द्वन्द से मन जूझ रहा 
बचपन से जो है सबने कहा 
मान रहे हैं, मानेंगे आगे भी 
पर मेरा चाहा वो जानेंगे कभी?

बचपन से मुझे पढाया क्यों ?
स्वतंत्र विचार बनाया क्यों?
जब आज अलग कुछ सोचूं तो
इतनी दिक्कत होती है सबको

और आगे तो बढ़ सकती हूँ
जो चाहूं वो कर सकती हूँ
पर माँ-बाबा का वो चेहरा
देता हर पल दिल पर पहरा

अब समझ नहीं कुछ आता है
कोई बचाने क्यों नहीं आता है?
जो हाथ पकड़ ले जाये मुझे 
हर फ़िक्र दुःख से बचाए मुझे 

जिसे पकड़ के दम भर रो लूँ मैं
फिर साड़ी मजबूरी भूलूँ मैं 
एक दिन आकर मुझे बचाएगा 
कब तक रुकेगा, वो आएगा