Monday, October 10, 2011

क्यों ढूँढू तुमको मैं, जाने अनजानों में


जाना पहचाना सा, देखा था एक चेहरा 
टूट गया पल में, था दिल पर जो पहरा 
सामने आओ तो, तुम तुम नहीं लगती हो 
जैसे ही ओझल हो, क्यों जख्म लगे गहरा

बड़ी अजब पहेली ये, कैसे सुलझाऊं मैं 
क्यों ढूँढू तुमको मैं, जाने अनजानों में


एक बात पुरानी सी, रह रह कर याद आये 
जब करते थे मन की, चाहे दुनिया जल जाये 
फ़िक्र आज भी औरों की, करते हैं नहीं लेकिन 
जिक्र एक मगर सुनकर, दिल मेरा घबराये

उस बात पुरानी को, कैसे बिसराऊँ मैं 
क्यों ढूँढू तुमको मैं, जाने अनजानों में


संग हाथ पकड़ के जब, हम रस्ते चलते थे 
दिखता था सच में रब, जब संग में रहते थे 
होठों पर हंसी रहती, सपने से भरी आँखें 
अलग ही दुनिया इनकी, ये सारे कहते थे

दिल की दुनिया औरों को, कैसे दिखलाऊँ मैं 
क्यों ढूँढू तुमको मैं, जाने अनजानों में 

Tuesday, October 4, 2011

डेढ़ घंटे !!!



बीते जमाने में तो, हँसते थे मिलके सबसे 
संग खेलने को उनके, बहाने नए बनाके
बापू से छुप-छुपाके, अम्मा से गिडगिडाके
आकर देर तक पढूंगा, भरोसा ये दिलाके
डेढ़ घंटे की आज़ादी, थी जान से भी प्यारी 
जब खेलते थे जीभर, जमती थी अपनी यारी 
वैसा ही डेढ़ घंटा,  बरसों बीते पर न आता 
हुए बहुत दिन अब मुझे कोई यार न बनाता

क्रिकेट में वो बीती शामें, जब ख़ुशी से बल्ला थामे
निकलती थी अपनी टोली, दीवाली हो या हो होली 
गेंद-बल्ला के होते, एक मौका हम न खोते
त्यौहार भी मनाते, पर डेढ़ घंटा न गंवाते 
पंडितजी की वो झिडकी, गेंद उनके घर जो जाये,
थोड़ी देर को थमे सब, अब वापस कौन लाये 
जिसने था  शॉट  मारा,  थी उसकी जिम्मेदारी
उस वक़्त संग गया जो, पक्का यार बन गया वो 

उस डेढ़ घन्टे में तो, झगडे भी खूब होते 
ऐसे भी दिन गए कुछ, लौटे जब रोते रोते 
सबने लाख समझाया, करते हो रोज वक़्त जाया
अब से खेल बंद करो तुम, अव्वल दरजे के बनो तुम
कुछ करके है दिखाना, तो अपनी संगति सुधारो 
अब ज्यादा तुमको पढना, खेल-कूद को बिसारो 
उस डेढ़ घंटे की पढाई, ने एक रोजी भी दिलाई 
पर यारी जो तबसे छूटी, ताउम्र मुझसे रूठी 

अब सोच में पड़ा हूँ, कैसे भूल है हुई ये 
गए जो डेढ़ घंटे, हुई हलकी जिन्दगी ये 
था हिसाब जो लगाया, चौबीस से डेढ़ कम आया 
पर इतने दिन तो बीते, चुकने पाया न बकाया 
जो स्कूल में पढ़ाया, गणित काम नहीं आया 
हिसाब जिन्दगी का अबतक, किसी ने नहीं सिखाया 
उस डेढ़ घंटे की कीमत, जिंदगी ने यूँ लगाया 
इतने साल अब तो बीते, किसीने यार न बनाया 

Sunday, October 2, 2011

यूँ इतराता फिरू मैं....

क्यूँ बन गया नौकर तो, यूँ इतराता फिरू मैं 
अब भर गया जो पेट तो, न मन की सुनूँ  मैं 

चाकरी तो चाकरी, फिर क्या अच्छा क्या बुरा 
सब ताख पर जब रखकर, बस चारा चरुं मैं 

कुछ आगे बढ़ चुके हैं, जो छुटे पीछे  भागें 
बेफिक्र चलने वालों से, क्यूँ बात करूँ मैं 

अब आह भी न सुनते, अब वाह भी न करते 
बस एक राह चलते-चलते, ये उम्र भरूँ मैं 

ऐसी भी लत क्या उनकी, जो छूटने न पाए 
जीते जी जीने की जब, यूँ छोड़ रहूँ मैं 

प्यासे भी कुछ हैं ऐसे, पानी में हर पल रहते 
पर जान नहीं पाते, क्या उनसे कहूँ मैं 

खीर में नमक और बाकी थाली पूरी खाली 
जिंदगानी की कहानी, और कैसे कहूँ मैं