Monday, October 10, 2011

क्यों ढूँढू तुमको मैं, जाने अनजानों में


जाना पहचाना सा, देखा था एक चेहरा 
टूट गया पल में, था दिल पर जो पहरा 
सामने आओ तो, तुम तुम नहीं लगती हो 
जैसे ही ओझल हो, क्यों जख्म लगे गहरा

बड़ी अजब पहेली ये, कैसे सुलझाऊं मैं 
क्यों ढूँढू तुमको मैं, जाने अनजानों में


एक बात पुरानी सी, रह रह कर याद आये 
जब करते थे मन की, चाहे दुनिया जल जाये 
फ़िक्र आज भी औरों की, करते हैं नहीं लेकिन 
जिक्र एक मगर सुनकर, दिल मेरा घबराये

उस बात पुरानी को, कैसे बिसराऊँ मैं 
क्यों ढूँढू तुमको मैं, जाने अनजानों में


संग हाथ पकड़ के जब, हम रस्ते चलते थे 
दिखता था सच में रब, जब संग में रहते थे 
होठों पर हंसी रहती, सपने से भरी आँखें 
अलग ही दुनिया इनकी, ये सारे कहते थे

दिल की दुनिया औरों को, कैसे दिखलाऊँ मैं 
क्यों ढूँढू तुमको मैं, जाने अनजानों में 

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