Wednesday, November 3, 2010

एक रास्ता सब के लिए तो इस जीवन ने छोड़ा है



बस दो पल का वो अंतर, और वर्षों का अथक प्रयास
पाट न पाया कोई अबतक, सागर बूँद से गया हार
अब न ऐसा सोचेंगे, एक क्षण का मिलन भी थोड़ा है
एक रास्ता सब के लिए तो इस जीवन ने छोड़ा है


हमने जो भी कहा था तुमसे, तुम किसी से न कहना
हर पल जो चुपचाप सहा था, तुम कभी भी न सहना
टूट गयी थी बांध जो मुझसे, जाने में अनजाने में
उन दीवारों से दूर ही, धीरे-धीरे तुम बहना


             सागर दूर हुआ तो क्या, तुम गंगा में ही मिल जाओ
             जो अपना लेता है हंसकर, वहीँ तो सच्चा बसेरा है
             एक रास्ता सब के ................


राम ने जब प्रत्यंचा चढ़ाई, तभी जानकी आई थी
मोहन के मुरली को सुनकर, राधा नहीं रुक पाई थी
देर से ही पर मिली थी ठंडक, उर्मिला की आह को
श्याम का रस जो विष-प्याला में, मीरा नहीं भरमाई थी


            धनुष, बांसुरी, समय, गरल या और भी कोई शर्त हो तो
            पर ज्ञात नहीं कब ख़त्म है मेरा, और कहाँ से शुरू तेरा है
            एक रास्ता सब के ....................

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