Wednesday, July 6, 2011

मेरा चश्मा टूट गया है

पहले तो चंचल को देखे, मन मेरा मुस्काता था
जिन बातों की शहद रस में, दिल घुलता सा जाता था 
नन्ही सी मुट्ठी से मेरी ऊँगली को जोरों से पकड़ना 
तोतली बोली में शिकायत करके फिर अचानक से हंस पड़ना
अब तो बस ऊब सी आती, वो एहसास कहीं छूट गया है
तब जो पहना करता था वो मेरा चश्मा टूट गया है

आम के छाए के नीचे तब जेठ की ताप भी हंसकर जाती
चावल दाल और आम की चटनी स्वाद ये मन को बड़ी लुभाती
अब वही खाने को दो तो, बात हैसियत की हो जाती
दो पल ए सी बंद रहे तो, त्योरी अपनी यूँ चढ़ जाती
गंगा का गंगोत्री से अब सारा संपर्क छूट गया है
तब जो पहना करता था वो मेरा चश्मा टूट गया है

बातें तो करते हज़ार पर अन्दर एक सन्नाटा रहता है
झूठी हंसी की चीत्कार को हर कोई चुप चुप सहता है 
इसके साथ या उसके साथ, किसी का न कोई जगन्नाथ
सबकी मुट्ठी बंद हो तो, फिर कैसे हो हाथों में हाथ
सुनहरे सपनों का नन्हा शीशा न जाने कब से फूट गया है
तब जो पहना करता था वो मेरा चश्मा टूट गया है

सब चलते तो चल लेता हूँ, सब रुकते तो रुक भी जाता
थोड़ी देर की बात जो होती मन के आगे झुक भी जाता
लेकिन ये एक बार की कोशिश, न जाने पर कब बन गयी आदत
हसरत को दफना देने की, बस रह गयी है एक दिल में हसरत
हाथ में रहता जाम है अब ये, राम तो कबका छूट गया है
तब जो पहना करता था वो मेरा चश्मा टूट गया है



1 comment:

  1. उद्वेलि‍त करती अभि‍व्‍यक्‍ति‍....

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